डी.डी. पंत जी मेरे गुरु थे, जिन्होंने मुझे दिशा दी और अपना आशीर्वाद दिया। इन्द्रमणि बडोनी जी मेरे राजनीतिक गुरु रहे, जिनके साथ रहकर मैंने संघर्ष करना सीखा और उन्होंने जीवन भर मुझे खूब स्नेह दिया। बिपिन त्रिपाठी जी मेरे लिए हमेशा बड़े भाई रहे, जिनके साथ मैंने न जाने कितनी यात्राएँ कीं। उनके साथ लगातार चर्चाएँ और बहस होती रहती थीं। बिपिन दा के साथ मेरा रिश्ता अलग ही था। वे भाई थे, दोस्त थे और मार्गदर्शक थे, जो प्यार भी करते थे और जरूरत पड़ने पर झिड़क भी देते थे।
जब मैं राजनीति में आया, बिपिन दा उससे पहले ही लोगों के बीच एक जाना-पहचाना नाम हो गए थे। वे कुमाऊँ में जन आंदोलन, सामाजिक आंदोलन और राजनीतिक आंदोलन का एक बड़ा नाम बन गए थे। आपातकाल के दौरान देश में जेल में सबसे अधिक समय बिताने वाले नेताओं में बिपिन दा भी थे। उन्होंने दो साल से अधिक समय जेल में बिताया।
जब उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी शुरू की, तो जनता से उन्हें खूब प्यार मिला। वे ब्लॉक प्रमुख बने और जब उत्तराखंड राज्य बना, तो द्वाराहाट विधानसभा से पहले विधायक बने। बिपिन दा जहाँ भी सभा में जाते, उन्हें सुनने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ जाती थी। लोग उन्हें ध्यान से सुनते थे। आज द्वाराहाट में जो कुछ भी है, वह बिपिन दा की देन है। चाहे कॉलेज हो, स्कूल हो या इंजीनियरिंग कॉलेज—उन्होंने विधायक बनने से पहले ही इनके लिए संघर्ष किया और अपने द्वाराहाट क्षेत्र के लोगों को ये सौगातें दिलाईं। आज भी लोग उन्हें उनके किए संघर्षों और कार्यों के लिए याद करते हैं।
उत्तराखंड क्रांति दल के तो वे थिंक टैंक थे। संगठन के लिए क्या नीतियाँ होंगी, राज्य के लिए क्या नीतियाँ होनी चाहिए—इन सब पर उन्होंने गंभीरता से काम किया। उन्होंने उत्तराखंड क्रांति दल के लिए विजन डॉक्यूमेंट बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
राज्य बनने के बाद पहले चुनाव में बिपिन दा द्वाराहाट से विधायक चुने गए। उस वक्त नारायण दत्त तिवारी जी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी। बिपिन दा ने विधानसभा के अंदर और बाहर, दोनों जगह कांग्रेस सरकार को घेरकर रखा और उत्तराखंड के हित में नीतियाँ बनाने के लिए लगातार लड़ते रहे।
यह हमारा और राज्य का दुर्भाग्य है कि बिपिन दा का 2004 में आकस्मिक निधन हो गया। बिपिन दा का अचानक चले जाना हमारे संगठन के लिए सबसे बड़ा नुकसान था। इस राज्य को जिस नेतृत्व की सबसे ज्यादा जरूरत थी, वह बिपिन दा थे। आज अगर बिपिन दा होते, तो राज्य के हालात यूँ न होते। मुझे मालूम है, बिपिन दा लड़ जाते और सत्ता को घुटनों पर ले आते।
बिपिन दा के जाने से हम और संगठन, दोनों कमजोर हुए। हमें और संगठन को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी। बिपिन दा, आपकी अनुपस्थिति में उत्तराखंड की स्थिति देखकर मन व्यथित होता है। वैसे, आज आप ज़िंदा होते तो आप भी बहुत दुखी होते। आज के राजनीतिक, सामाजिक और देश तथा राज्य के हालात देखकर व्यवस्था को कोसते।
बिपिन दा, आप बहुत जल्दी चले गए। आज हमेंआपकी सबसे ज्यादा जरूरत थी । आप हमारी सबसे बड़ी ताकत थे, हमारी हिम्मत थे। आज उत्तराखंड क्रांति दल को आपकी सबसे ज्यादा जरूरत थी।
आज आपको गए हुए 22 साल से भी ज्यादा हो गए हैं। आप बहुत याद आते हो, बिपिन दा।
आपको सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि आपके दिखाए संघर्ष की राह पर हम चलते रहें।
बिपिन दा के बारे में क्या लिखूँ, जितना लिखूँगा, उतना कम ही होगा। उनके साथ एक लंबा समय बिताया। उनके साथ संघर्षों का साथी, काशी सिंह ऐरी





