उत्तराखंड के चिकित्सालयों में लापरवाही की वजह से होने वाली मौतों की गंभीरता से जांच की जाए तो जांच के आंकड़े चौंकाने वाले होंगे

यदि प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 1 वर्ष पूर्व अपनी जनता के प्रति थोड़ी भी संवेदनशीलता दिखाई होती तो बागेश्वर चिकित्सालय की लापरवाही की वजह से मौत के मुंह में चले गए 14 माह के शिवांश के पिता को अपने मृत बच्चे को न्याय दिलवाने के लिए दर-दर नहीं भटकना पड़ता और ना ही न्यायपालिका की शरण में जाकर आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के आदेश करवाने पड़ते ।
पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री के पद में बैठकर अपनी जनता के लिए कितने गंभीर हैं यह सवाल शिवांश को न्याय दिलवानी की जगह है शिवांश की मृत्यु के मामले को रफा दफा होने देने की स्थिति में धकेल कर उन्होंने साबित कर दिया है।

यदि शिवांश के पिता जागरूक नहीं होते तो शिवांश की मृत्यु का मामला 1 साल पहले ही दफन करने में धामी सरकार का प्रशासन सफल हो गया था। शिवांश की मौत के 1 साल बाद उत्तराखंड में चमोली जनपद की जिला अदालत ने चमोली जनपद के थराली क्षेत्र के 14 वर्षीय बच्चे के उपचार में घोर लापरवाही बरतने के कारण हुई बच्चे की मृत्यु को गंभीरता से लेते हुए बागेश्वर चिकित्सालय के चिकित्सकों पर मुकदमा दायर करने का आदेश थराली की पुलिस को दिया है। थराली की पुलिस ने बिना लाग लपेट के जीरो एफआईआर करके अपने आप को भले ही मामले से किनारे कर लिया लेकिन इसी जीरो एफआईआर के आधार पर बागेश्वर पुलिस को तब बागेश्वर चिकित्सालय में तैनात चिकित्सकों पर मुकदमा दर्ज करना ही पड़ा ।

यदि उत्तराखंड राज्य में आरएसएस की थमी सरकार पूरी तरह से इंसल्ट प्रूफ हो चुकी है तब उस सरकार से कुछ कहना ही बेकार है इसके इतर यदि धामी सरकार में थोड़ी भी शर्म, लज्जा बची है तो उन्हें चमोली न्यायालय के आदेश के बाद शर्म से गढ़ जाना चाहिए था। चमोली अदालत के आदेश के 36 घंटे के बाद तक धामी जी की ओर से या फिर स्वयं धामी जी द्वारा इस प्रकरण पर कोई भी बयान नहीं दिया गया है को लेकर पूरे पहाड़ में सवाल उठ ही रहे हैं ।

यहां बता दिया जाए कि उत्तराखंड के चिकित्सालयों में घोर लापरवाही की वजह से मरीजों के का मर जाना आम बात हो गई है। यदि उत्तराखंड के चिकित्सालयों में लापरवाही की वजह से होने वाली मौतों की गंभीरता से जांच की जाए तो जांच के आंकड़े चौंका देंगे। उत्तराखंड में सामाजिक और राजनीतिक चेतना का ही अभाव है कि चिकित्सालयों में होने वाली मौतों को लेकर परिजन जांच की मांग के लिए सक्षम कुर्सियों के सामने या अदालतों में जाते ही नहीं है।

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