‘ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के अब अंधेरा जीत लेंगे, लोग मेरे गांव के’-(चारु तिवारी)

अस्सी के दशक में हम लोग सामाजिक जीवन में आ रहे थे। काॅलेज के दिनों में जब उत्तराखंड में कोई राजनीतिक हलचल या आंदोलन होते तो उसमें शामिल होते। इससे पहले हम अल्मोड़ा में कर्मचारियों के जुलूस-प्रदर्शन देखते थे। उन दिनों कर्मचारी और ट्रेड यूनियनें अपनी मांगों को लेकर काफी सक्रिय रहती थी। छात्र-युवा भी देश और क्षेत्रीय समस्याओं को लेकर सड़कों पर रहते थे। पहली बार हम 1984में ‘नशा नहीं, रोजगार दो’ आंदोलन में शामिल हुए। इसी दौर में हमारे नजदीक ‘ताडीखेत ब्रांच फैक्टरी’ के श्रमिकों का भी आंदोलन चल रहा था। और फिर उत्तराखंड राज्य आंदोलन।

उस दौर में जितने भी आंदोलन चल रहे थे, उनका शीर्षक जनगीत था- ‘ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के/अब अंधेरा जीत लेंगे, लोग मेरे गांव के।’ एक तरह से प्रतिकार के इस गहरे गीत ने ही हमारी पीढ़ी के लिए जन चेतना की बड़ी खिड़की खोली। उस समय पता नहीं था कि पूरी दुनिया के शोषित, दमित, दलित, मजदूरों, आदिवासियों, महिलाओं और संघर्षरत समाज की आवाज बनने वाले इस गीत का रचनाकार हमारे आस-पास ही कहीं है। अब हमें इस बात पर हमेशा गर्व रहता है कि हमारे बड़े भाई बल्ली सिंह चीमा जी से हमारे आत्मीय संबंध हैं। आज हम सबके आदरणीय और प्रिय जनकवि बल्ली सिंह चीमा का जन्मदिन है। उन्हें जन्मदिन की बहुत-बहुत बधाई। शुभकामनाएं। उनका सान्निध्य हमें हमेशा मिलता रहे।

बल्ली जी से मिलने का मतलब एक ऐसे किसान से मिलना है जो अनाज के साथ चेतना की फसल उगाता है। जिसकी खेती में नई पौंध, नये संकल्प, नये संघर्ष, आमजन की संवेदनाओं में लिपटी गजलों की गूंज है। वह खेत में लहलहाती है। सड़क पर उतरती है। सत्ताओं को हिलाती है। उनकी रचनाओं में शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ जो स्वर हैं वे वंचितों, मजदूर, किसानों, महिलाओं और दलितों की आवाज के रूप में फूटते हैं। उनका गीत- ‘ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के/अब अंधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गांव के’ देश के कई आंदोलनों की प्रेरणा बना।

जनकवि बल्ली सिंह चीमा हमारे समय के उन गीतकार, कवि और गजलकारों में हैं, जिन्होंने गैर बराबरी और दमन पर टिकी व्यवस्था के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है। बल्ली सिंह चीमा का जन्म पंजाब के जिला- अमृतसर, तहसील- चमाल के चीमा खुर्द गांव में 2 सितंबर, 1952 को हुआ था। बाद में 1975 से वे नैनीताल जनपद की तराई के मडैयाबक्शी गांव में आ गये। यही रहकर उन्होंने खेती के साथ अपना लेखन और जन आंदोलनों में हिस्सेदारी की। हालांकि उनकी पहली कविता 1973 में ‘चर्चा’ में प्रकाशित हो गई थी। उन्होंने अपना सतत लेखन 1976 से कर दिया था, लेकिन उन्हें ख्याति 1978 में लिखे गीत ‘ले मशालें…’ से ही मिली। जन संस्कृति मंच के साथ जुड़कर उन्होंने देशभर के प्रमुख आंदोलनों में हिस्सेदारी की। ‘नशा नहीं, रोजगार दो’ से लेकर उत्तराखंड राज्य आंदोलन और मौजूदा समय में चल रहे आंदोलनों में उनके गीत गाए जाते हैं। वे स्वयं उनमें भाग लेते हैं। पिछले सालों में देशभर में जो किसान आंदोलन चले हैं, उनमें उनकी प्रमुख भूमिका रही है। दिल्ली में एक साल तक चले किसान आंदोलन में उनकी केंद्रीय भूमिका रही।

बहुत सारी गजले और गीत हैं बल्ली सिंह चीमा के। उनकी कृतियों में ‘खामोशी के खिलाफ’, ‘जमीन से उठती आवाज’, ‘तय करो किस ओर हो’, ‘हादसा क्या चीज है’ प्रमुख हैं। जनगीतों से हमारा उनसे बहुत पुराना नाता रहा है। बहुत नजदीक का। बहुत अपना सा। मिलना भी नया नहीं है। लगभग नब्बे के दशक का। पिछले दो दशक से बहुत निकटता है। बड़े भाई की तरह। उन्हें जन्मदिन की पुनः बधाई। शुभकामनाएं। हमें उनके और भी जनगीत सुनने को मिलेंगे। वह स्वस्थ और रचनाशील रहें।

उन्होंने इस बीच और भी बहुत से गीत लिखे हैं। एक जनगीत जो आज उत्तराखंड की तबाही के समय बहुत प्रासंगिक लगता है। प्राकृतिक संसाधनों की लूट और सरकार की नीतियों पर चोट करता है। यह जनगीत बल्ली सिंह चीमा के तेवर भी बताता है-

साथी जल, जंगल, जमीन का बचना बहुत जरूरी है,
इसीलिए अंधे विकास से लड़ना बहुत जरूरी है।

जिनको रहबर चुनते हैं हम वो रहगन बन जाता है,
धर्म, जाति, झूठे वादों से जनता को बहलाता है।
पूंजीवादी लोकतंत्र का भंडाफोड जरूरी है
इसीलिए अंधे विकास से लड़ना बहुत जरूरी है।

किसी सेठ को आत्महत्या करके मरते ना देखा,
किसी किसान को पैसा लेकर परदेश भागते ना देखा।
सही समय पर सही दाम फसलों का मिले जरूरी है,
इसीलिए अंधे विकास से लड़ना बहुत जरूरी है।

मजदूर-किसान की हालत हर दिन खस्ता होती जाती है,
शहरों में हर सेठ की दौलत दुगुनी होती जाती है।
कोई खाता सूखी रोटी कोई हलवा पूडी है,
इसीलिए अंधे विकास से लड़ना बहुत जरूरी है।


दूर क्यों हमसे उजाला, इसकी भी चर्चा करो।
है कहां सूरज हमारा, इसकी भी चर्चा करो।

वोल्गा मैली हुई है, कह रहे हो बार-बार,
क्या है गंगा का नजारा, इसकी भी चर्चा करो।

खूबसूरत है इमारत, ये हकीकत है मगर,
किसने ढोया ईंट-गारा, इसकी भी चर्चा करो।

कान कटवाकर भी, जो जिन्दा रही उस भैंस को,
फाइलों में किसने मारा, इसकी भी चर्चा करो।

तुम गमे-जानां को ही क्यों कोसते रहते हो यार,
क्यों गमे-दौरां ने मारा, इसकी भी चर्चा करो।


सूर्य मरने के ऐलान अपनी जगह,
हैं अंधेरे परेशान अपनी जगह।

भूखे बच्चे हैं हैरान अपनी जगह,
दूध पीते हैं भगवान अपनी जगह।

हक से वंचित है इंसान अपनी जगह,
खूबसूरत है संविधान अपनी जगह।

तन पे कायम है ईमान अपनी जगह,
मन में जिन्दा है शैतान अपनी जगह।

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