नेहा के संघर्ष के बहाने –

राजतंत्र मिश्रित साम्राज्यवाद को भारतीय व्यवस्था में ब्राह्मणवाद के रूप में देखा और समझा जाता है । ऐसा देखा और समझ जाना परिभाषित और तर्कसंगत भी है। ब्राह्मणवाद का अर्थ कहीं से कहीं तक ब्राह्मण जाति की व्यवस्था से नहीं है।

भारत में मुगलकालीन व्यवस्था के दौरान हिंदुओं की पूरी व्यवस्था मनुवाद से ही ओतप्रोत थी जिस पर कभी भी मुगल साम्राज्य ने कानूनी प्रतिबंध नहीं लगाए थे।

ब्रिटिश साम्राज्य से हमारी लड़ाई आर्थिक आजादी के साथ-साथ मनुवादी व्यवस्था से आजादी की लड़ाई भी थी, महिला पुरुषों में असमानता विधवाओं का नारकीय जीवन सती प्रथा महिलाओं को दासी के रूप में स्वीकारने वाला पुरुष वर्चस्व, जातिवाद की गहरी गहरी खाई यही सब मनुवाद था जिसे समाप्त करने के लिए अतीत में लड़ाइयां लड़ी जाती रही हैं । अभी भी हम मनुवाद को पूरी तरह से समाप्त नहीं कर पाए इसीलिए मनुवाद से आजादी का नारा जिंदा है

नेहा के आंदोलन को कमजोर करने के लिए उमर खालिद का नाम उसके आंदोलन के साथ जोड़ा जा रहा है। उमर खालिद का मामला न्यायालय के संज्ञान में है अभी उस पर सुनवाई भी शुरू नहीं हुई है। जब तक न्यायालय उमर खालिद के प्रकरण की पूरी सुनवाई नहीं कर लेता है तब तक इस विषय में बोलना अनपढ़ जमात का प्रलाप माना जाएगा कि नहीं! उमर खालिद पर जो आरोप लगे हैं उन आरोपों के लिए निर्धारित सजा से अधिक समय तक तो उमर को जेल में कैद रखा जा चुका है। यदि न्यायालय ने उमर खालिद के मुकदमे पर समय रहते हुए सुनवाई कर ली होती तो नौजवान भ्रमित होकर स्याही फेंकने जैसे घृणित कृत्य तो नहीं कर रहे होते।

सनद रहे कि पढ़ने लिखने वालों के लिए स्याही लिखने का साधन है और पढ़ाई लिखाई से नफरत करने वालों के लिए स्याही दूसरे पर फेंक कर उसे गंदा करने की चीज है।

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