नेहा बोरा होना एक बहुत लंबी वैचारिक प्रक्रिया से गुजरना है-(चारु तिवारी)

आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा के रांची जाने और वहां आंदोलनरत छात्रों को समर्थन देने से एक बड़े वर्ग में ऐसी पीड़ा हुई कि उसने उनकी चार पीढ़ियों को लाकर खड़ा कर दिया। सोशल मीडिया में उत्तराखंड का एक ऐसा वर्ग सामने आया जो उसे इस बात पर दुत्कार रहा था कि वह ‘वामपंथी’ है। उन्होंने यहां तक कह दिया कि पहाड़ में तो इस तरह के ‘देशद्रोही’ होते ही नहीं हैं। यह उन लोगों के बयान थे, जिनको अभी तक पता ही नहीं था कि नेहा बोरा का संबंध पहाड़ से है। वह लोग उस पर स्याही फेंके जाने को सही बता रहे हैं। उन्हीं की तरह जो जंतर-मंतर पर आंदोलनरत छात्रों को राष्ट्रद्रोही, विदेशी फंड से पोषित, आतंकी, आंदोलनजीवी जैसे नामों से संबोधित कर रहे थे। सोशल मीडिया में टिप्पणी कर रहे अधिकतर लोगों को यह दिक्कत थी कि वह ‘कम्युनिस्ट है।

किसी के विचार से असहमत होना लोकतंत्र की खासियत है। हमें विचार के स्तर पर किसी से भी असहमत होने का अधिकार है; वह अपने परिवार में माता-पिता ही क्यों न हों! किसी को किसी उम्र, जाति, क्षेत्र या उच्च पद पर होने से यह अधिकार नहीं मिल जाता है कि वही सही हैं। नई पीढ़ी हर कालखंड में अपने को नये विचारों और नये प्रारूपों में अभिव्यक्त करती है। उसका स्वागत किया जाना चाहिये।

नेहा बोरा होना एक बहुत लंबी वैचारिक प्रक्रिया से गुजरना है। इसमें गहन अध्ययन, इतिहास-संस्कृति का बोध, दुनिया को अपनी तरह से देखने की दृष्टि वर्तमान के संघर्ष और उसमें शामिल होने की जिजीविषा चाहिए। नेहा जैसे वैचारिक युवाओं को गढ़ने मे वैज्ञानिक समझ और जमीन के संकटों को व्यावहारिक रूप से परिभाषित करने वाले कारकों को योगदान होता है। नेहा को सिर्फ उत्तराखंड का मानना भी गलत है। इस तरह के विचार की धारा कभी भी वाद से परे होती है। इस धारा में कोई धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र और लिंग का भेदभाव नहीं है। वह समाज की गैरबराबरी को वैश्विक रूप में देखती है।

मानवाधिकार का हनन भारत में हो या अमेरिका में, पाकिस्तान में हो या नेपाल में किसी को भी खड़ा होना चाहिए। महिलाओं, दलितों और कमजोर वर्गों के सवाल पूरी दुनिया में एक जैसे होते हैं। उन्हें समझना बहुत जरूरी है। हम अपने यहां उन सवालों को कैसे उठाते हैं और देश के अन्य हिस्सों में चल रहे आंदोलनों के साथ कैसे जोड़ते हैं, यह तभी समझ में आयेगा जब हमने अपनी समझ का दायरा खुला छोड़ा हो।

सोशल मीडिया में उत्तराखंड के एक साथी ने मेरे से पूछा आपकी सारी बात मान लेते हैं, यह बताओ कि नेहा कामरेड है या नहीं! वह ‘लाल सलाम’ वाली है या नहीं! मैंने उन साथी को जबाव दिया- हां, है ना! कामरेड है। लाल सलाम वाली ही है। कामरेड का मतलब साथी होता है। साथी होना, दोस्त होना क्या गुनाह है।

अगर कामरेड होना गुनाह है तो टिहरी रियासत से मुक्ति के लिए शहादत देने वाले नागेंद्र सकलानी और मोलू भरदारी कामरेड ही थे। जिस उत्तराखंड की बात आज आप कर रहे हैं उसकी सबसे पहली प्रभावी मांग और उसे जन-जन तक ले जाने का काम कामरेड पीसी जोशी ने किया। पेशावर विद्रोह के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली भी कामरेड थे। उत्तराखंड के जिस गीत के बिना आपकी कोई महफिल या आयोजन पूरा नहीं होता वह गीत ‘बेडू पाको बारामासा….’ भी दुनिया तक पहुंचाने वाले मोहन उप्रेती कामरेड थे। जिस चिपको आंदोलन को आप अपनी थाती मानते हो, उसके प्रणेता और पूरे चमोली जनपद में जंगलों को बचाने के लिए आंदोलन का सूत्रपात करने वाले भी कामरेड गोविंद सिंह रावत ही थे। कामरेड गोविंद सिंह नेगी, कामरेड कमलाराम नौटियाल, कामरेड विद्यासागर नौटियाल से तो आप परिचित ही होंगे। यह सब उत्तराखंड के वो चुनिंदा लोग हैं जो कम्युनिस्ट पार्टियों में थे और यहां के जल, जंगल और जमीन की लड़ाई लडते रहे। साहित्य, संगीत, कला, पत्रकारिता, रंगमंच, सिनेमा, संस्कृति में सबसे ज्यादा काम कामरेडों का ही है। इसलिए कामरेडो को इतना ‘खतरनाक’ न समझें। रचनात्मक लोगों और विचार का सदभावना के साथ स्वागत करें, वह वामपंथी हों या किसी अन्य विचार को मानने वाले। यह भी बताना कि क्या जिन लोगों का मैंने नाम लिखा है, वे आपके आदर्श हैं या नहीं!

नेहा बोरा ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर 23 दिन की भूख हड़ताल की। देश में छात्र-युवाओं को एकजुट करने और उन्हें लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने की समझ दी। वह बहुत तार्किक और तथ्यात्मक तरीके से उन सब सवालों को संबोधित करती हैं, जिनसे छात्र-युवा परेशान हैं। यही कारण था कि केंद्र के एक ताकतवर शिक्षा मंत्री को न केवल इस्तीफा देना पड़ा, बल्कि छात्रों-नौजवानों की आवाज के आगे देश के प्रधानमंत्री को अलग से वीडियो बनाने पड़े।

जो सरकार और मीडिया इन बच्चों को राष्ट्रद्रोही और विदेशी फंडिंग वाला बता रही थी, उन्हें कहना पड़ा कि जेन-जी ज्यादा ईमानदार और राष्ट्रभक्त है। आरएसएस प्रमुख डाॅ. मोहन भागवत, जिनका पूरा कुनवा जंतर-मंतर में इकट्ठा नई पीढ़ी को राष्ट्र के लिए खतरा बता रहे थे, उनको जेन-जी के साथ न केवल संवाद करने आना पड़ा, बल्कि कहना पड़ा कि यह पीढ़ी ज्यादा ईमानदार और राष्ट्रभक्त है। इसलिए नेहा बोरा या उनकी विचारधारा से खूब असहमत होइये, लेकिन नई पीढ़ी जो बात कर रही है, उसे हल्के में लेने की गलती न करें।

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