हल्द्वानी में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली के बाद मंच का शुद्धिकरण किये जाने की घटना निंदनीय है. यह निश्चित ही जातिवाद के अहंकार से उन्मत्त हो कर एक राष्ट्रीय नेता को जातीय आधार पर अपमानित करने के लिए किया गया कृत्य है.
देश में संविधान लागू होने के साथ ही अस्पृश्यता यानि छुआछूत ख़त्म कर दी गयी है. छुआछूत वाला आचरण करने के विरुद्ध कानून हैं. लेकिन धरातल पर न जातीय भेदभाव ख़त्म हुआ और ना ही छुआछूत ! गाहे-बगाहे जातीय आधार पर भेदभाव और छुआछूत भरा आचरण प्रदर्शित होता रहता है और यह जानलेवा हद तक प्रदर्शित होता रहता है. इसे करने वाले अपने आचरण से तो शर्मिंदा नहीं होते पर इस बात से बड़े आहत होते हैं कि उन्हें जातिवादी कहा जा रहा है. वे जातीय आधार पर किये जाने वाले भेदभाव या हत्या जैसे जघन्य अपराध से उतना आहत नहीं होते, जितना उन्हें जातिवादी ठहराए जाने या समाज में जातिवाद होने की बात कहे जाने से, स्वयं को कष्ट में महसूस करते हैं.
एक राष्ट्रीय नेता के मंच से जाने के बाद उसके खिलाफ व्हाट्स ऐप ज्ञान पर आधारित वक्तव्य दे कर शुद्धिकरण को जायज ठहराने की कोशिश की जा रही है. उत्तराखंड में जातीय घृणा और सांप्रदायिक घृणा के पोषक तत्वों को किस तरह का सरकारी संरक्षण और खुली छूट मिली हुई है, यह इससे समझा जा सकता है कि खड़गे के मंच का तथाकथित शुद्धिकरण करने वाले खुलेआम घूम-घूम कर अपने कृत्य को सही ठहराने वाले वक्तव्य दे रहे हैं. उनके खिलाफ अब तक भी कोई कार्यवाही नहीं हुई है. उनके इस कृत्य को तथाकथित शुद्धिकरण इसलिए लिखा गया है क्योंकि जिनका खुद का मस्तिष्क इतना अशुद्ध, इतना प्रदूषित है, उनसे किसी भी चीज का शुद्धिकरण भला कैसे होगा, वे बस प्रदूषण ही फैला सकते हैं !
संसद में मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा मामला उठाए जाने के बाद केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा ने राज्यसभा में इस कृत्य की निंदा कर दी, उसे सबके लिए दुखदायी बता दिया, भाजपा को इससे असंबद्ध घोषित कर दिया, इसकी जांच की भी घोषणा कर दी.
लेकिन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगता है कि अपनी ही पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, केन्द्रीय मंत्री और राज्यसभा के नेता सदन के द्वारा जाहिर अफ़सोस से खुद को संबद्ध नहीं कर पा रहे हैं. वे इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस को ही कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं ! ये प्रदूषित मस्तिष्क वाले जो शुद्धिकरण कर रहे थे, आपका उनसे क्या संबंध है, मुख्यमंत्री जी ? आप अपने एक पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, केंद्रीय मंत्री और राज्यसभा के नेता सदन की तरह इस कृत्य की भर्त्सना क्यों नहीं कर पा रहे हैं ? क्या उन्हें आपका संरक्षण प्राप्त है ? संसद में मामला उठने के बाद भी इस दुष्कृत्य के आरोपियों के विरुद्ध यदि कोई कार्यवाही नहीं हो रही है तो क्या इसमें आपका आरोपियों के प्रति नरम रुख ही वो कारक है, जिसकी वजह से पुलिस कोई भी कदम उठाने से बच रही है ? पुलिस से तो फिर यह कहना ही है कि सत्ता के रुख के हिसाब से नहीं कानून सम्मत, संविधान सम्मत कदम उठाएं, कार्यवाही करें.
पूरे देश में उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए और अपने भोले-भाले, भले लोगों के जाना जाता था. लेकिन पिछले कुछ अरसे से, ख़ास तौर पर धामी जी के शासन काल के दौरान उत्तराखंड की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर सांप्रदायिक और जातीय उन्माद की घटनाओं की वजह से ही अक्सर होती रहती है. धामी जी भले ही इसे “पांच साल, बेमिसाल ” करार दें, लेकिन उत्तराखंड के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है.






