क्या “अज्ञात” आरोपियों के बचाव का नया दांव है ?-(इंद्रेश मैखुरी)

अंततः कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के मंच के शुद्धिकरण मामले में नैनीताल की पुलिस ने हल्द्वानी में एफआईआर दर्ज कर ली है.

मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा मामला राज्यसभा में उठाए जाने के बाद केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा द्वारा जो जांच का आश्वासन देश के उच्च सदन में दिया गया था, उससे ऐसा लगा था कि सरकार यह जांच करवाएगी. लेकिन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट जिस तरह से उक्त शुद्धिकरण को सही ठहराने के लिए कुतर्क गढ़ते रहे, उससे साफ हो गया था कि सरकार का तो जांच कराने का कोई इरादा नहीं है. जब तक ऊपरी इशारा या सहमति न हो तब तक भाजपा जैसी पार्टी में यह कैसे संभव है कि केंद्रीय मंत्री जो राज्यसभा में नेता सदन हैं, पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, वो सदन में घटना पर अफसोस प्रकट करें, जांच का आश्वासन दें और उसी सदन के सदस्य, प्रदेश अध्यक्ष व राज्य के मुख्यमंत्री, उस घटना पर बिल्कुल विपरीत रुख अख्तियार कर लें !

बहरहाल मंच शुद्धिकरण मामले में हल्द्वानी में जो एफआईआर दर्ज हुई है, वो तहरीर अधिवक्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता अंजू की ओर से दी गयी है. हालांकि वे तहरीर काफी दिन पहले दे चुकी थीं, लेकिन एफआईआर अब जा कर दर्ज हुई है. नैनीताल के एसएसपी के बयान से भी स्पष्ट है कि शिकायत पहले दे दी गयी थी, एफआईआर अब दर्ज हुई है. एफआईआर के प्रारूप में एक कॉलम है- शिकायत देरी से दर्ज कराने का कारण- यह कॉलम खाली है क्योंकि देर शिकायतकर्ता ने नहीं पुलिस ने की है.

काफी दबाव के बाद नैनीताल जिले के पुलिस ने जो एफआईआर दर्ज की है, उसमें आरोपी “अज्ञात” हैं ! पर क्या वाकई इस प्रकरण में अभियुक्त या आरोपी अज्ञात हैं, उनका कोई पता- पहचान नहीं है ? इस प्रकरण में तो मंच शुद्धिकरण का पूरा कारनामा पूरी ठसक और दंभ के साथ किया गया. करने वालों ने इसका वीडियो जारी किया. जब मामले पर विवाद हुआ तो वे अपने (दुष्) कृत्य को सही ठहराते हुए मीडिया में बाइट देते रहे. उनके चेहरे और पहचान सब सार्वजनिक है . तो फिर उनके विरुद्ध एफआईआर नामजद क्यों नहीं है ?

उत्तराखंड में सत्ता संरक्षित सांप्रदायिक और जातीय अपराधों में लिप्त आरोपियों को बचाने का यह आजमाया हुआ दांव है कि जिन अपराधों को सत्ता का समर्थन रहे, उनमें आरोपी का नाम लिखने में पुलिस शर्माती है ! देहरादून के बैरागीवाला में सांप्रदायिक उन्मादियों ने पुलिस पर हमला किया पर पुलिस उन्हें पहचान ही नहीं पाई और अज्ञात में मुकदमा दर्ज किया, कोटद्वार के दीपक कुमार यानि मोहम्मद दीपक के जिम के बाहर गाली- गलौच और उत्पात करने वालों के चेहरे सारे उत्तराखंड ने देखे पर पुलिस के लिए वे भी अज्ञात ही रहे.

पता नहीं यह क्या चमत्कार है कि घृणा अपराधों के आरोपियों को पुलिस पहचान ही नहीं पाती और वे अज्ञात ही बने रहते हैं, वो तो मंत्री- मुख्यमंत्री सबको पहचानते हैं पर मुकदमा लिखते हुए पुलिस उन्हें नहीं पहचानती !

यह आरोपियों को बचाने का उत्तराखंड पुलिस का पैंतरा है, जिसका प्रयोग हल्द्वानी मंच शुद्धिकरण में भी कर दिया गया है और यह पैंतरा एफआईआर दर्ज करके भी कार्यवाही न करने के लिए है ! पुलिस घृणा अपराध वालों से इतनी मित्र क्यों है, यह समझना मुश्किल नहीं है ! घृणा अपराध वाले मित्र पुलिस के राजनीतिक आकाओं (political bosses) के पाले- पोसे हैं, इसलिए मित्र पुलिस के लिए वे सदा अज्ञात हैं !

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