शर्म आए तो खुद पर करोश्री काशी सिंह ऐरी जी जैसे अनुभवी आंदोलनकारी पर सवाल उठाने से पहले उत्तराखंड का राजनीतिक इतिहास पढ़ो-(किसान पुत्र कार्तिक उपाध्याय)

(उत्तराखंड क्रांति दल के अंदर जो कुछ भी चल रहा है वह उनका निजी मामला है लेकिन जो भी उत्तराखंड क्रांति दल के अंदर चल रहा है उस चल रहे में यदि किसी ऐसे नेता पर भी आरोप लगते हो जो नेता उत्तराखंड क्रांति दल के वरिष्ठ नेताओं से पहले जनता के बीच एक स्थापित नेता हो तब जनता की ओर से सवाल उठने स्वाभाविक हैं।
उत्तराखंड क्रांति दल के अंदर से ही काशी सिंह ऐरी पर उछाले गए आरोपों के बाद हल्द्वानी के युवा नेता कार्तिकेय में गुस्सा फूटना स्वाभाविक था। कार्तिकेय का गुस्सा उनके फेसबुक पोस्ट में सार्वजनिक हुआ है । कार्तिकेय की वह पोस्ट सभी ने पढ़नी भी चाहिए -“रमेश कृषक” ) ।

शर्म आए तो खुद पर करो
श्री काशी सिंह ऐरी जी जैसे अनुभवी आंदोलनकारी पर सवाल उठाने से पहले उत्तराखंड का राजनीतिक इतिहास पढ़ो

मैं उस पीढ़ी का व्यक्ति नहीं हूं जिसने उत्तराखंड राज्य बनते हुए अपनी आंखों से देखा। लेकिन मैंने व्यक्तिगत रूप से उत्तराखंड को पढ़ा है। किताबों में, दस्तावेजों में, उपलब्ध आंकड़ों में और राज्य आंदोलन के इतिहास में। मैंने यह जानने और समझने का प्रयास किया है कि यह राज्य किन संघर्षों से निकला, किन लोगों ने इसके लिए अपना जीवन लगाया और जिस उत्तराखंड में आज हम राजनीति कर रहे हैं, उसकी बुनियाद किन लोगों के संघर्ष पर खड़ी है।

मेरी उम्र कम है, लेकिन मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे आदरणीय दिवाकर भट्ट जी, त्रिवेंद्र सिंह पंवार जी सहित उत्तराखंड की कई राजनीतिक और आंदोलनकारी धरोहरों के साथ काम करने और उन्हें करीब से समझने का अवसर मिला। इन लोगों के दशकों के अनुभव के सामने मैंने कभी अपने कुछ वर्षों के अनुभव को खड़ा करने की मूर्खता नहीं की।

मैंने उनकी नीतियां पढ़ीं। उत्तराखंड को समझा। पहाड़ी राज्य की अवधारणा समझी। पहाड़ी समुदाय समझा। पहाड़ का खेत, किसान, पलायन, रोजगार और राज्य की मूल समस्याओं को समझने की कोशिश की।

और इसी यात्रा में जिन लोगों को जानने और सुनने का अवसर मिला, उनमें एक महत्वपूर्ण नाम है—आदरणीय काशी सिंह ऐरी जी।

आज बड़ा आश्चर्य होता है कि सोशल मीडिया पर कुछ वर्षों में राजनीति सीख लेने वाले लोग काशी सिंह ऐरी जैसे व्यक्ति की राजनीतिक समझ और निष्ठा का प्रमाणपत्र बांट रहे हैं।
जिस व्यक्ति ने उत्तराखंड की राजनीति के कई दौर देखे हों, राज्य आंदोलन देखा हो, अनेक दिग्गज आंदोलनकारियों और नेताओं के साथ राजनीतिक यात्रा की हो, उम्र के इस पड़ाव पर उससे यह पूछा जाए कि वह किसका “प्रवक्ता” है—तो सवाल काशी सिंह ऐरी जी पर कम और सवाल पूछने वालों की राजनीतिक समझ पर ज्यादा खड़ा होता है।

काशी सिंह ऐरी जी को किसी के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है। उनका राजनीतिक जीवन स्वयं उनका परिचय है।

मतभेद काशी सिंह ऐरी जी से भी हो सकते हैं। वरिष्ठ नेता भी गलत निर्णय ले सकते हैं। उनकी आलोचना भी होनी चाहिए। लेकिन राजनीतिक असहमति के नाम पर दशकों के संघर्ष और अनुभव को एक सोशल मीडिया पोस्ट या इंटरव्यू से छोटा साबित करने की कोशिश करना राजनीतिक अपरिपक्वता है।

शर्म आए तो खुद पर करो।

मैंने उत्तराखंड क्रांति दल के साथ काम किया है। मेरे जीवन में यदि किसी राजनीतिक दल की सदस्यता रही तो वह उत्तराखंड क्रांति दल की रही। बाद में मुझे उक्रांद की राजनीतिक परिस्थितियां अपने अनुरूप नहीं लगीं, इसलिए रास्ते अलग हुए। मैं आज उक्रांद की राजनीति का हिस्सा नहीं हूं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि उसके इतिहास और उसके संघर्षशील लोगों के योगदान को नकार दूं।

बल्कि मैं उक्रांद का एक बात के लिए हमेशा आभारी रहूंगा,उक्रांद ने मुझे उत्तराखंड की धरोहरों से मिलवाया।
उनमें से एक आदरणीय काशी सिंह ऐरी जी हैं।

मैंने उन्हें करीब से जितना जाना, सुना और उनके राजनीतिक अनुभव को जितना समझा, उसके बाद सोशल मीडिया पर उनके लिए इस्तेमाल हो रही भाषा देखकर यही कह सकता हूं—पहले स्वयं को खोजिए, अपना राजनीतिक इतिहास देखिए और फिर उस पीढ़ी पर उंगली उठाइए जिसने अपना जीवन उत्तराखंड की राजनीति और राज्य के सवालों में लगाया।

युवा आगे आएं। नेतृत्व करें। पुराने नेताओं से सवाल करें। उनकी गलतियों को भी सामने रखें। लेकिन वरिष्ठों का अपमान करके कोई युवा बड़ा नेता नहीं बन जाता।

और एक बात बिल्कुल स्पष्ट है— उत्तराखंड क्रांति दल किसी एक नेता की जागीर नहीं है। किसी व्यक्ति, परिवार या गुट की संपत्ति नहीं है। उक्रांद किसी के बाप की बपौती नहीं है।

यह उत्तराखंड आंदोलन की राजनीतिक विरासत से निकला दल है। इस पर जितना अधिकार आज के युवाओं का है, उतना ही सम्मान उन लोगों के संघर्ष का भी होना चाहिए जिन्होंने इसे अपने जीवन के दशकों दिए।

काशी सिंह ऐरी जी से राजनीतिक असहमति रखिए, उनके निर्णयों पर सवाल उठाइए—लेकिन उनके पूरे राजनीतिक जीवन को कटघरे में खड़ा करने से पहले अपना राजनीतिक कद भी जरूर नाप लीजिए।

इतिहास फेसबुक पोस्ट से नहीं बनता और दशकों का संघर्ष एक वायरल इंटरव्यू से छोटा नहीं हो जाता।
आदरणीय काशी सिंह ऐरी जी के राजनीतिक संघर्ष और अनुभव का मैं व्यक्तिगत रूप से सम्मान करता हूं और उनके विरुद्ध अमर्यादित भाषा का स्पष्ट विरोध करता हूं।

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