पूर्व पोस्ट से जारी-
एंटोनियो डी एंड्रेड, पुर्तगाली जेसुइट पादरी थे। वे हिमालय पार कर तिब्बत पहुंचने वाले पहले ज्ञात यूरोपीय थे। उन्होंने पश्चिमी तिब्बत के छपरांग में कैथोलिक मिशन स्थापित किया था। सन् 1624 में श्रीनगर, बदरीनाथ होकर माणा दर्रे से उन्होंने तिब्बत में प्रवेश किया था। प्रस्तुत विवरण, उनके पत्रों पर आधारित पुस्तक- ओ डेस्कोब्रिमेंटो दो तिब्बत, से लिया गया है। विवरण रोचक और लंबा है। इसलिए शेष हिस्सा, अगली पोस्ट में दिया जाएगा। पेश है पुर्तगीज में प्रकाशित विवरण का हिंदी अनुवाद-
सन् 1624 के मार्च की तीस तारीख को हम आगरा से रवाना हुए। जब हम दिल्ली पहुंचे, वहां बहुत-से हिंदू (गैर-ईसाई) एक प्रसिद्ध मंदिर (बदरीनाथ) की तीर्थयात्रा पर निकल रहे थे। यह मंदिर आगरा से डेढ़ महीने की दूरी पर था। ऐसे लोग हमारे मार्गदर्शक हो सकते थे। हम यह अवसर खोना नहीं चाहते थे।
दिल्ली से मुगलों जैसे वस्त्र पहनकर हम पूरी गोपनीयता के साथ अल सुबह रवाना हुए। नगर के फाटकों से बाहर निकलते ही, हमने वे वस्त्र उतार दिए और पगड़ी-लबादा पहन लिया।
पंद्रह दिन बाद हम हिंदुस्तान की सीमा पारकर श्रीनगर (गढ़वाल) पहुँचे। श्रीनगर के राजा की भूमि में प्रवेश करने में बड़ी कठिनाइयाँ हुईं। मुगल देश के लोग हमें मुगल भगोड़ा समझते थे, और किसी भी दशा में आगे नहीं जाने देना चाहते थे। ऐसे भगोड़ों को बंदी बनाकर राजा के पास भेजने का आदेश था। उनका यह संदेह इसलिए और पक्का होता था कि हम न तो हिंदू थे, न व्यापारी। दूसरी ओर श्रीनगर राजा के लोग हमें उनके इलाके में भेजे गए मुगल जासूस समझते थे। कुछ दिन इसी उलझन में बीते, और जब लगने लगा कि हमारे लिए सभी मार्ग पूरी तरह बंद हो जाएँगे, तब ईश्वर ने हमें खुला मार्ग दे दिया, और हमें सिखाया कि उसी पर भरोसा रखें जिसकी महिमा के लिए हम यह यात्रा कर रहे थे।
दुनिया की सबसे ऊँची और दुर्गम पहाड़ियाँ
बड़ी लगन और उल्लास के साथ हमने पहाड़ियाँ चढ़नी शुरू कीं। ये संसार की सबसे ऊँची और दुर्गम पहाड़ियाँ प्रतीत होती हैं, और मैं इस कठिनाई का सही वर्णन नहीं कर सकता। केवल यह बताना पर्याप्त होगा कि, दो दिन तक सुबह से रात तक चलने पर भी हम इन्हें पार नहीं कर पाए। ऊँची-ऊँची चोटियों पर रास्ता इतना संकरा होता था कि कई जगह केवल एक पैर रखने भर की जगह थी। पहाड़ियों के गहरे तल में भयंकर गर्जना के साथ गंगा नदी बहती है। लेकिन हिन्दू तीर्थयात्री जय बद्रीनाथ के नारे लगाते हुए एक के पीछे एक चलकर रास्ते को पार कर रहे थे। उन्हें देखकर हमें भी खतरनाक रास्ता पार करने की प्रेरणा मिली।
यात्रा मार्ग पर अनके भव्य मंदिर मिलते थे। मंदिरों के रखवालों और सेवकों के रूप में इनके पास बहुत-से जोगी होते हैं, जो अपनी वेशभूषा से शैतान के सेवक लगते हैं। हमने देखा, एक वृ जोगी, जिसके नाखून और बाल बढ़े हुए थे। चेहरा इतना विकृत था कि वह साक्षात शैतान प्रतीत होता था। वह एक शब्द बोले बिना, मूर्ति की तरह, हिंदुओं की स्तुति और प्रणाम स्वीकार करता था, जो जमीन पर लोटकर उसके पैर चूमते थे।
श्रीनगर में राजा निवास करते हैं। उनके राज्य में श्रीनगर के अलावा दूसरा कोई नगर नहीं है। बल्कि छोटे कस्बों जैसे अनगिनत गाँव हैं। इस भूमि के लोग रीति-रिवाजों में हिंदुस्तानी लोगों से बहुत भिन्न हैं। वे जिन भेड़-बकरियों को खाते हैं, उनका गला नहीं काटते बल्कि गला घोंट देते हैं। वे कहते हैं- खून शरीर में फैलने से मांस ज्यादा स्वादिस्ट हो जाता है। वे बिना खाल उतारे, भेड़ को हल्का सा भूनकर, अधपके मांस को, जिसमें से रक्त बहता रहता है, खाते हैं। सामान्यतः वे नंगे पैर चलते हैं। पैर, फटने और घावों से इतने कठोर हो जाते हैं कि बिना किसी परेशानी के तीखे पत्थरों और काँटों पर भी दौड़ लगाते हैं। इस नगर में हमारी कड़ी जाँच-पड़ताल हुई कि हम कौन हैं और हमारा उद्देश्य क्या है। हम यह नहीं कह सकते थे कि, हम व्यापारी हैं क्योंकि हमारे पास कोई माल नहीं था। इसलिए मैंने कहा, मैं पुर्तगाली हूँ और वर्षों से तिब्बत में रह रहे अपने भाई की खोज में जा रहा हूं। मुझे बताया गया कि पूछताछ करने वाला राजा है। हमारे सामान की जांच करते हुए जब उन्होंने काले लबादे देखे, तो इसका कारण पूछा। मैंने कहा, पहनने के लिए ले जा रहे हैं। यदि भाई मर गया होगा तो ये शोक के चिन्ह के रूप में काम आएंगे। क्योंकि यह हमारे देश का प्रचलित रंग है। इससे उन्हें विश्वास हो गया कि, वहाँ मेरा कोई भाई होगा। पाँच दिनों बाद, उन्होंने हमें आगे जाने दिया।
कैसे गिर सकती है इतनी बर्फ
हम यथासंभव शीघ्रता से लगभग पंद्रह दिन चलते रहे। रास्ता अब पहले की अपेक्षा कम दुर्गम था। पहाड़ियों को पार करके हम बर्फ से भरी अन्य पहाड़ियों में पहुँचे। हमने गंगा नदी (अलकनंदा) को कई बार पार किया। रस्सी वाले डरावने पुलों से नहीं, बल्कि उस बर्फ के ऊपर से जो नदी के बड़े हिस्से को ढके हुए थी। नदी, बर्फ के नीचे भारी गर्जना के साथ गुजरती थी। मैं यह समझ नहीं पाया कि इतनी बर्फ कैसे गिर सकती है कि इतनी विशाल नदी पर पुल बन जाएं। मुझे लगता है कि, पहाड़ियां, बर्फ के बोझ को सहन नहीं कर पाती और ढेर के रूप में यह नदी पर गिरती हैं। अपने भार व गिरने से सघन और ठोस होकर नदी को ढक देती है। बर्फ में कहीं-कहीं भयानक गुफाएँ और दरारें हैं, जो ऊपर से गुजरने वालों को बेहद डरा देती हैं। क्योंकि यह नहीं पता होता कि किस समय और किस स्थान पर वे प्राकृतिक पुल गिर पड़ेंगे। जैसा कि अक्सर होता है, और बहुतों के लिए वे कब्र बन जाती हैं।
डेढ़ महीने बाद हम बद्रीनाथ पहुँचे जो श्रीनगर की सीमा पर है। यहाँ दूर-दूर के क्षेत्रों से, जैसे सीलोन (श्रीलंका) और विजयनगर से भी, बड़ी संख्या में लोग तीर्थयात्रा पर आते हैं। जब हम गोवा से लौटे थे, तो हमारे साथ सीलोन के दो सिंहली युवक आए थे, जिन्होंने इस बदरीनाथ की अपनी तीर्थयात्रा पूरी कर ली थी। उन्होंने शिकायत की कि, भरण-पोषण के लिए उन्हें भिक्षा नहीं मिल पा रही थी। मुझे उन पर दया आई और मैंने उन्हें कुछ सिक्के दिए। परंतु यह जानकर कि हम हिंदू नहीं हैं, उन्होंने भिक्षा स्वीकार नहीं की। उनका कहना था कि, वे केवल ब्राह्मणों या बनियों से ही भिक्षा लेते हैं।






