कभी मुख़ातिब होना अपने कर्मों पर
कि एक दिन में कितने झूठ बोले, कितने कपड़े बदले
कितने अगल-बगल, आगे-पीछे, ऊपर-नीचे
शानदार कमांडो से घिरे होने की ललक में
भीड़ को अभिवादन करते
इतने आत्ममुग्ध हुए कि आम आदमी को भूल गए
कहां के वायदे, इकरार
तुमने तो दर्द दे डाले उन लोगों को
जो जन्म से लेकर मौत तक
एक मुकम्मल ज़िंदगी तरसते रहे
वो भी चाहते थे कुछ भोग-उपभोग
बच्चों की शिक्षा…
पर कहां तुमने ऐसा होने दिया
गरीबपरवर बनने की हवस में
जल-जंगल-जमीन-आकाश
उन्हें चंद लोगों को न्योछावर कर
गिरवी रख दिया
चौड़ी चमकती सड़कों के लिए
न जाने कितनी आरियां चलती हैं
कलेजे पर छुरियां
हवाएं दम घोंटती हैं
कोई भी कथित भविष्यवक्ता
बांच नहीं सकता ऐसे में भविष्य
आदमी की हरकतों से परेशान अंतरिक्ष
यह चहल-पहल, ठाठ-बाट
ये विशाल मॉल, चमचमाता अजेय बाज़ार
ये उधार लिए धार्मिक उद्गार
नशे की लत का व्यापार
ये बाढ़, धधकते समुद्र,
दरकते पहाड़, जिसके रह गए हाड़ ही हाड़
ये सूखती दरिया
समुद्र में अपना मुंह कब तक छिपाएगी!
राहत शिविर में राहत कब तक आएगी!
ये बहशी हथियार
विश्व युद्ध, गृहयुद्ध
ये रोज़-रोज़ उदास सूरज
ढलती शाम, बुढ़ापे-सी रात
ऐ ख़ुदाबंद! बड़े एहतियात से दी थी तुमने ज़िंदगी
तेरे रहम-ओ-करम के रहते वो भी मुरझा गई
श्मशान से लेकर क़ब्र तक दफ़ना गई
और तुम किसी प्राचीर से दहाड़ रहे हो
हो जाने की बख़िया उधाड़ रहे हो
गीत ख़ुशहाली के धता दे गए
जेल में सड़ गए सपने
ना सवाल करने की इजाज़त
ना ज़वाबदेही
जो दिमाग़ समझ के लिए,
आनंद लेने के लिए बना था
वो बावला हो गया
न्याय के स्वर अज़नबी हो गए
असहाय लोग उसकी चौखट में
सिर पटक-पटककर मर गए
हमने भी कभी सवाल उठाए थे
आगे बढ़कर मशाल लिए
उजालों के नग़्मे गाए थे
हां! बस हमारी पीढ़ी के नाम न थे
फिर भी हम बदनाम न थे
ये शरीर पर आत्मा का बोझ
जर्जर होता आत्मबोध
इस बाज़ार की दहशत में
उन झोपड़-पट्टियों की बेतहाशा याद आती है
जिनकी आस बेइंतहा ग़रीबी
रोज़ की दिहाड़ी में लिपट जाती है
कार्ल मार्क्स, मैकियावेली
इन हालातों में भी अब तक ज़िंदा हैं
सब कुछ कहने, कर गुज़रने के बाद
मीलॉर्ड! कुछ बचता नहीं
तुम्हें समर्पित, मीलॉर्ड!
यह असुरक्षित समाज
डरी-सहमी आवाज़
ये कविता कहें या लेख
जिसका एकमात्र श्रोता रचनाकार
बिना लिए आधार कार्ड
कोई नहीं पहचान
सिर्फ़ मैं हूं
किए गए गुनाहों के लिए
(जो किए ही न थे, थोपे गए थे)
उन्हें चाहिए एक आज़ादी का दिन
सुना है उस दिन कृपा बरसती है
आज़ादी मिलती है
यह सज़ा-ए-मौत की सज़ा
उम्र-क़ैद में बदलती है
ज़िल्ल-ए-इलाही! मीलॉर्ड! परवरदिगार!
कह भी दें ‘ऑब्जेक्शन सस्पेंड’
बाइज़्ज़त रिहाई
नो एक्सक्यूज़, नो गवाही
गेट खुले
निहारते मुक्त आकाश
उड़ने के लिए बेकरार…






