धार्मिक उन्माद, असहाय कानून-(डॉ प्रभात उप्रेती)

लिखने को मन नहीं करता। लेखन में धार तो है पर सत्ताधारियों ने अपने धर्म की धार इतनी मजबूत बना ली है कि अपनी धार उससे टकराकर भोथरी हो जाती है।

आज से 20 साल पहले हरिद्वार में एक दुकानदार ने मुझसे कहा कि अब कांवड़ियों का समय आ गया है और वह इतनी अराजकता फैलाते हैं कि हम शाम के 6 बजे ही दुकान बंद करके चले जाते हैं। उनकी बात इसलिए याद आई क्योंकि हाल ही में मैं सफ़र में था तो सड़क की एक लेन यातायात के लिए कावड़ियों के कारण बंद थी। हमारे एक मित्र ने भी कहा कि परसों मैं हरिद्वार से हल्द्वानी आया, तो 4 घंटे लेट हो गया, कावड़ियों के कारण रास्ता बदल दिया गया था।

सनातन धर्म की भी आजकल बहुत चर्चा है। सनातन धर्म का सबसे अच्छा भाग मुझे वह लगा जिसमें वैचारिक स्वतंत्रता है। यह धर्म का सबसे बढ़िया दस्तावेज है। वर्तमान में सनातन और हिंदू धर्म खतरे में हैं – यह हवाला देते हुए, हिंदू धर्म और कमजोर बन गया है। और सनातन विवादास्पद हो गया।

हमारे एक मित्र कह रहे थे कि यह कावड़िए बहुत तपस्या करते हैं। कावड़ ले जाना इतना कठिन काम है, आप उसे एक सेकंड भी कंधे से नहीं उतार सकते। मीलों पैदल चलना पड़ता है। यह सच है कि हर कांवड़िया उन्मादी या अराजक नहीं है। लाखों श्रद्धालु कठिन यात्रा करते हैं, कई संयम रखते हैं, दूसरों की मदद भी करते हैं और पूरी आस्था के साथ अपने गंतव्य तक पहुंचते हैं। उनकी इस तपस्या पर प्रणाम तो बनता है पर आज जिस तरह से कई कांवड़िए रास्तों में उधम मचा रहे हैं, डीजे बजा रहे हैं, अराजकता का वह मंजर बना देते हैं कि यूपी और उत्तराखंड पुलिस असहाय भाव से देखती रहती है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को वर्तमान राजनीतिक घटनाओं में जनता यह कहते हुए क्लीन चिट दे रही है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश में कानूनी व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए माफियाओं को किनारे कर दिया है और कानून का शासन लागू किया है। यह कैसा कानून का शासन है कि कांवड़िए कारों में तोड़फोड़ कर देते हैं, उधम मचाते हैं। अगर कोई पुलिस अधिकारी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई भी करता है तो उस का स्थानांतरण हो जाता है । ऊपर से रास्ते बंद होने की वजह से लोगों का आना-जाना भी मुश्किल हो गया है। उत्तर प्रदेश में तो कई शहरों में स्कूल -कॉलेज ही 9-10 दिन के लिए बंद हैं।

ठीक है यह यात्रा युवाओं श्रद्धालुओं के लिए एक एडवेंचर है, उत्साह है, हम भी बम-भोले के फैन हैं।
पर हर धर्म को राजनीति का मकसद बनाना, ताजिया मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा को कानून से ऊपर कर उन्मादी बनाना, सिस्टम को किनारे कर देना, आपके मकसद के क्रिमिनल एप्टिट्यूड को दर्शाता है। कुछ तो परदादारी हो।

यह धार्मिक उन्माद हमारे देश में हमारे लोकतंत्र को कहां तक ले जाएगा। सारे विश्व में युद्ध के कारण एक अराजक व्यवस्था बन गई है, जिसमें बेवजह करोड़ों जनता खत्म होती जा रही है। यह तो मानसिक मनोवैज्ञानिक संक्रमण का गेम बन गया है।

संस्कृति धर्म का अंग नहीं, धर्म संस्कृति का अंग है। वह यथार्थ से निकली लोक कविता है। धर्म का व्यावसायीकरण और राजनीतिक उपयोग बढ़ता दिखाई देता है। हिंदू या कोई अन्य धर्म, अगर आतंकी बने तो क्या वह धर्म को धारण करता है!

आस्था एक मनोवैज्ञानिक हीलिंग है। उसके लिए सम्मान की दरकार है। मगर आस्था के नाम पर यह कानूनी छूट, लोकतंत्र के मायने को ही गायब कर देती है।

कांवड़ यात्रा तो खत्म हो ही जाएगी फिर कोई धर्म आगे आ जाएगा। कठिन उबड़-खाबड़ रास्तों पर धर्म के नाम पर हमें जो सत्ता ले जा रही है, यह तो मानसिक संक्रमण पैदा कर रही है और आने वाली पीढ़ी को वैज्ञानिक सोच से दूर ले जा रही है।
हमें विश्व गुरु का रुतबा नहीं चाहिए, एक सरल सामाजिक भय रहित समाज चाहिए, जहां हर व्यक्ति सही उन्नत जीवन जिए। धार्मिक प्रतीकों श्रद्धाओ का हर नैतिकता का उल्लंघन जो राजनेताओं ने सत्ता पाने के लिए किया है उससे नेता धर्म हमारे लिए जीवन पथ के राहगीर नहीं पनौती हो गये हैं।

विश्व के पुस्तकालयों में ठसाठस भरे साहित्य में धर्म मुक्ति की बात करता है न कि फट्रस्टेड अवैज्ञानिक सोच से उपजी जीवन मूल्य को तबाह करने की साज़िश का हथियार। विश्व के सुरक्षित अच्छी लाइफ स्टाइल देश में नागरिक सुरक्षा को धर्म के नाम पर कभी वंचित नहीं किया जाता।

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