2 वर्ष पहले वर्ष 2024 में एक दिन अचानक से सोशल मीडिया में एक तस्वीर तैरने लगी । कुछ तस्वीरों पर बहुत चर्चा नहीं होनी चाहिए और हुई भी नहीं। मैं आज भी उस तस्वीर पर चर्चा नहीं कर रहा हूं।
2 वर्ष पूर्व वह तस्वीर दिखाना भी आपत्तिजनक था और अगर वह तस्वीर सच थी तो शायद उससे अधिक आपत्तिजनक तो कुछ था ही नहीं। जिस व्यक्ति की वह तस्वीर तब बताई जा रही थी उस व्यक्ति का एक बयान अखबार में छपा था कि उसने डीजीपी से शिकायत कर दी है। अब जो भी तस्वीर पर बोलेगा, हल्ला करेगा उससे डीजीपी निपटेंगे ।
डीजीपी थाना नहीं होते हैं लेकिन जीरो एफआईआर का रास्ता उस चिट्ठी से खुल ही जाता था।
समय आगे बढ़ता गया और लोग उस घटना को भूल गए। फिर अचानक से बीते रोज वहीं घटना बहुत अधिक संवेदनशील और चौंकाने वाले अंदाज में फिर से सामने आई। इस बार बिटिया ने गुहार लगाई कि वर्ष 2024 में सोशल मीडिया में डाली गई घटना से वह आहत है, बहुत परेशान है, और चिंतित है कि उन्होंने ( कपकोट विधायक ने ) आज तक उस घटना पर एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मेरी इज्जत बचाने की पहल क्यों नहीं की। सोशल मीडिया में सामने आई बिटिया ने सवाल पूछा है कि क्या मेरी इज्जत इज्जत नहीं है । और भी बहुत कुछ उसने कहा है।
एक बिटिया अगर अपने दर्द को लेकर सामने आती है तो समाज उस दर्द को सुनता है, समझता है, उस पर बहस करता है, चिंतन करता है, मंथन करता है। इधर दो दिन से समाज में यह सब हो भी रहा है । बिटिया द्वारा सोशल मीडिया में जारी किए गए बयान में केंद्रक यही था कि विधायक जी की वजह से उसका अपमान हुआ है उसका जीवन दांव पर लगा हुआ है लेकिन विधायक जी ने एक पत्रकार वार्ता कर उसका बचाव करना भी जरूरी नहीं समझा।
यह कल की घटना थी आज दोपहर को अचानक मालूम पड़ा कि विधायक ने पत्रकार वार्ता बुलाई है। पत्रकार वार्ता तो थी फर उस पत्रकार वार्ता में सवाल तो दिखाई नहीं दिए। वह एक प्रकार से स्पष्टीकरण था जो विधायक जी दे रहे थे, और विधायक ने जो भी कुछ कहा उसमें डीजीपी को लपेटा, कपकोट की पुलिस को लपेटा। विधायक का आशय यह था कि पुलिस मदद नहीं कर रही।
विधायक कपकोट के आज के बयान के बाद जो सबसे बड़ा सवाल उठा है वह यह कि जब उत्तराखंड की पुलिस विधायकों की ही नहीं सुन रही है तो फिर धामी जी को इस बात का उत्तर तो देना ही चाहिए कि क्या वास्तव में उत्तराखंड राज्य की पुलिस इतनी अधिक नकारा हो चुकी है कि वह एक विधायक के दर्द को, उसकी समस्या को, इसकी शिकायत को भी सुनना जरूरी नहीं समझ रही है या फिर विधायक जी एक बार फिर से पुलिस का इस्तेमाल करके पूरे एपिसोड पर चार विराम लगाना चाहते हैं।
एक मुद्दा जो समाप्त हो गया था अचानक फिर से जिंदा होता है और इस बार जब मुद्दा जिंदा हुआ तो वह हवा हवाई नहीं था। इस बार मुद्दा उन दो पात्रों में से एक पात्र ने स्वयं जीवित किया है जो दो पात्र पूर्व के मुद्दे में मौजूद थे । क्योंकि एक पात्र ने सवाल उठाया है तब दूसरे पात्र को मजबूर होकर आज प्रेस के सामने आना पड़ा।
यह पूरी घटना का एक पक्ष है लेकिन एक दूसरा पक्ष और है कि भारतीय जनता पार्टी जो महिला वंदन की बात करती है और अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर बुरी तरीके से घिरी हुई है और भी कई घटनाएं इस बीच में घटी है जो भारतीय जनता पार्टी पर सवाल उठाए हुए हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय जनता पार्टी का एक विधायक जो भाजपा के बहुत बड़े नेता भगत सिंह कोश्यारी के खासमखास में एक हैं तथा जिनको कपकोट में छोटा मुख्यमंत्री के रूप में भी पुकारा जाता है पर महिलाओं की आबरू से जुड़ा हुआ गंभीर सवाल लगा दिया जाता है तब इस सवाल के कुछ राजनीतिक मायने भी बनते ही हैं।
इस पूरी घटना में जब राजनीतिक मायने तलाशे जा रहे हैं तो मुद्दा यही बन रहा है कि क्या अब कपकोट विधायक को को फिर भाजपा चुनाव मैदान में उतारने की हिम्मत कर पाएगी ।





