क्यों मीडिया, बौद्धिक समाज और खुद अभिजीत दीपके नेहा और उनके साथियों को नजरंदाज कर रहे हैं -(त्रिलोकीनाथ)

आज के तमाम अखबार देखिए तो हर अखबार ने अभिजीत दीपके सौरव दास और आशुतोष रांका को जगह दी है। लगातार लिखने-पढ़ने वाले लोग भी इन्हीं की चर्चा कर रहे हैं लेकिन इस चर्चा में नेहा और उनके साथी गायब हैं। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि देश से वाम राजनीति के खात्मे के तमाम दावों के बावजूद आज भी वैचारिक तौर पर इस देश के पूँजीपति, व्यापारी अपना सबसे बड़ा दुश्मन वाम विचारधारा को मानते हैं। उन्हें आज भी वैचारिक तौर पर यदि कहीं से चुनौती मिलती है, तो वह वाम राजनीति है। यही कारण है कि मीडिया वाम नेताओं को उतना महत्त्व नहीं देता, जितना दूसरे नेताओं को।

वर्तमान बौद्धिक वर्ग में दक्षिणपंथ के साथ ही उदारवादी लोगों में ऐसे लोग बहुतायत हैं, जो बदलाव के हर प्रयास के विरोधी एवं यथास्थितिवाद के कट्टर समर्थक हैं जबकि वामपंथ की पूरी वैचारिकी बदलाव पर आधारित है। वह वर्ग हितों की बात करता है। आइसा जैसा छात्र संगठन समाज के सबसे वंचित वर्ग के अधिकारों, हितों की न सिर्फ बात करता है बल्कि मजबूती से लड़ाई लड़ते हुए दिखाई देता है। यही कारण है कि वर्तमान बौद्धिक वर्ग वाम राजनीति के प्रति डाह, ईर्ष्या, रखता है, और वाम राजनीति को डिस्क्रेडिट करने का काम करता है। वह नहीं चाहता कि कोई ऐसा नेता वाम वैचारिकी का उभर के आए जो उन्हें कटघरे में खड़ा करे, उनके विशेषाधिकारों को चुनौती दे एवं उनके लिए मुसीबत खड़ी कर दे। देश के किसी राज्य में वर्तमान में सरकार नहीं है फिर भी यदि मीडिया और बौद्धिक वर्ग वाम के प्रति पूर्वाग्रह रखता है, तो उसका कारण है वाम की वैचारिकी। वाम की विचारधारा है। उसका प्रतिरोधी स्वभाव है।यही कारण है कि AISA, SFI और DiSHA, AISF जैसे दूसरे छात्र संगठनों के योगदान को नजरंदाज करने का काम मीडिया के साथ ही बौद्धिक वर्ग भी बड़े शातिर तरीके से कर रहा है। मीडिया ने इन संगठनों और इनके नेताओं को कवरेज से लगभग गायब कर दिया।

तमाम किन्तु परंतु के बावजूद अभिजीत दीपके इस आंदोलन के सूत्रधार थे। उन्होंने ने कॉल दी। लोग एकजुट हुए। इस जुटान में वे वाम संगठन भी शामिल हुए जो बहुत पहले से सरकार की शिक्षा विरोधी नीतियों की आलोचना करने के साथ ही आंदोलनरत थे। साथ आने के बावजूद वाम संगठन के छात्र नेताओं से दीपके ने एक दूरी बनाए रखी। यह दूरी आंदोलन के समापन में भी जानबूझ कर बरती गई जबकि इस आंदोलन को खड़ा करने और उसे इतने दिनों तक कायम रखने में नेहा जैसे साथियों की अहम भूमिका थी। यह दूरी दीपके के सोशल मीडिया अकाउंट पर शेयर किए गए फोटो और वीडियो में भी देखी जा सकती है। जबकि इस आंदोलन में नेहा, मनीष, दानिश, अमीन, दीपक पहले दिन से ही भूख हड़ताल पर बैठ गए थे। दानिश और दीपक को सेहत बिगड़ने से हॉस्पिटल में भर्ती होना पड़ा लेकिन नेहा मनीष और अमीन ने 23वें दिन भूख हड़ताल खत्म की। फिर उन्हें क्रेडिट न देना आंदोलन के समापन में उन्हें शामिल न करना, दीपके की महत्वाकांक्षा को दर्शाता है।

सुखद बात ये रही कि मीडिया, बौद्धिक समाज और आंदोलन में शामिल लोगों द्वारा नजरंदाज करने के बावजूद आज नागरिक समाज नेहा को सर आंखों पर बिठाये हुए है। नेहा की वैचारिक दृढ़ता, स्पष्टवादिता, सौम्यता एवं अपनी बात रखने का जो वक्तृत्व कौशल है, वह हाल के किसी छात्र नेता में दिखाई नहीं देता। यही कारण है कि उन्हें लोग इतना ज्यादा पसंद कर रहे हैं। उन्हें पसंद करने वालों में हर वर्ग समुदाय और उम्र के लोग हैं। इस आंदोलन में यदि कोई एक चेहरा उभर कर आया है, तो वह नेहा का है। हालांकि इस आंदोलन में और इस जीत में हर बच्चे का महत्त्वपूर्ण योगदान है। नेहा में बात रखने का जो कौशल है, वक्तृत्व की जो ताकत है, लोगों को प्रभावित करने की जो क्षमता है, वह अद्भुत अद्वितीय है। उनकी बातें एक बड़े जन मानस को अपील करती है, उनके मन को छूती है, उन्हें गहरे प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि मुख्य विपक्षी पार्टी के नेता राहुल गांधी ने न सिर्फ नेहा और उनके साथियों से मुलाकात की, शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर व्यापक चर्चा की, बल्कि उन्हें मंच दिया, उनके साथ प्रेस कांफ्रेंस भी की। प्रेस कांफ्रेंस करने के बाद नेहा के संबोधन के समय राहुल का किनारे हटना और फ्रेम में दानिश को लाने का सलीका भी अच्छा लगा। प्रेस कांफ्रेंस में राहुल द्वारा यह कहना कि यही इस देश के भविष्य हैं, नेहा जैसे साथियों की समाज में व्यापक स्वीकृति को दर्शाता है।
त्रिलोकीनाथ

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x