बीस जुलाई की अगली सुबह-(अतुल कुलकर्नी)

रे पुलिस सिपाही लाठी वाले
क्या घर जा कर तू रोया कल ?
रे सांसद, मेरी संसंद वाले
क्या घर जा कर सो पाया कल?

मैं कल रोया ख़ून के आसूँ
ना मैं सोया, किस को कोसूँ
बच्ची मेरी नींद में चीखी
सपने में उसने लाठी देखी
रे सिपाही लाठी वाले

पुलिस सिपाही लाठी वाले
क्या घर जा कर तू रोया कल?
रे सांसद, मेरी संसंद वाले
क्या घर जा कर सो पाया कल ?

आखों में आसूँ सबके लिए
मुझे चाहिए वो सरकार
हाथ कपकपाते सबके लिए
मुझे चाहिए वो सरकार
मैं तो सीमा के अंदर हूँ
झप्पी क्यों है सीमापार
सबके लिए आखों में आसूँ
मुझे चाहिए वो सरकार

रे सांसद, मेरी संसंद वाले
क्या घर जा कर सो पाया कल?

ट्रोलीयाँ मुझको देने वाले
सहचर हो तुम, साथी भी
भारत माँ की कोख से जन्में
मैं भी, तू भी, ये भी- वो भी

लेकिन हाँ,
रे सांसद, मेरी संसंद वाले
क्या घर जा कर सो पाया कल?
रे पुलिस सिपाही लाठी वाले
क्या घर जा कर तू , रोया कल ?
अतुल कुलकर्नी

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