लोकतंत्र सिर्फ सत्तापक्ष से नहीं होता, विपक्ष भी उसमें महत्वपूर्ण होता है. आयोजन स्थल की अनुमति देने और बुकिंग करने के बाद उसे निरस्त करना विपक्ष की आवाज़ खामोश करने की कोशिश है.
परेड ग्राउंड की बुकिंग की धनराशि जमा करवाने के बाद उसे निरस्त करने के लिए जो तर्क सरकारी अफसर और सरकार के खर्च पर सोशल मीडिया पर की-बोर्ड चलाने वाले दे रहे हैं, वो बेहद हास्यास्पद है. कहा जा रहा है कि परेड ग्राउंड चूंकि देहरादून का केंद्रीय स्थल है, इसलिए वीक एंड पर वहां इतना बड़ा कार्यक्रम होने पर जाम की स्थिति बन जाएगी ! यह दिव्य ज्ञान सरकारी अफसरों और सरकारी खर्च पर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने वालों को कब हुआ- जब इस आयोजन के लिए लगभग पौने दो लाख रुपया जमा करवा दिया गया – तब ? नेता लोग और उनके द्वारा भाड़े पर सोशल मीडिया पोस्ट लिखने के लिए रखे लोग तो तर्क- कुतर्क की सीमा से परे हैं पर अफसर लोगो, आप तो कुछ होश की दवा खाओ, बुद्धि का प्रयोग करो ! इसी परेड ग्राउंड में पूरे उत्तराखंड और सहारनपुर, बिजनौर, नजीबाबाद आदि से ढो कर लाए गए लोगों की रैली को नरेंद्र मोदी चुनाव में संबोधित करते हैं, तब नहीं होती यह जाम की आशंका ! विपक्ष की भीड़ से ही जाम होगा और सत्ता पक्ष की भीड़, उनकी लोकप्रियता का प्रदर्शन होगा, हद है दोहरेपन की !
अगड़म-बगड़म बोलते रहने वाले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष कह रहे हैं कि राहुल गांधी को कोई सुनना नहीं चाहता, देखना नहीं चाहता ! अरे जब कोई देखना- सुनना नहीं चाहता तो बड़े मैदान की अनुमति निरस्त क्यों कर रहे हैं, करने दो बड़े मैदान में रैली, उसके बाद देना ऐसा बयान !
कुल मिला कर विपक्ष को कार्यक्रम न करने देने के लिए जिस तरह का प्रपंच भाजपा सरकार रच रही है, वो एक गलत परिपाटी है ! विपक्ष के प्रति इस तरह का शत्रुतापूर्ण, षड्यंत्रकारी दुराग्रह कतई स्वीकार्य नहीं है. यह उस लोकतंत्र की सेहत के लिए बेहद घातक है, जिसके मूल्यों को भाजपा नष्ट करने पर उतारू है.






