अभी एक फिल्म आई है’ ‘हनुमान अंश’। यह फिल्म नीम किरौली बाबा के जीवन और चमत्कारों पर आधारित है। इस फिल्म का कई नामी-गिरामी लोगों ने अपनी तरह से प्रचार किया है। लगभग दो करोड़ की लागत से बनी यह फिल्म अब एक सौ करोड़ के कारोबार के करीब पहुंच चुकी है। उत्तराखंड में स्थित कैंची धाम में बाबा की तपस्थली होने के कारण स्वाभाविक रूप से इस फिल्म के प्रति पहाड़ के लोगों का विशेष ध्यान भी गया होगा। अब तो देश-विदेश के उनके भक्त, अनुयाई, धर्मभीरू और देखा-देखी भी इस फिल्म के प्रमोशन में लग गये हैं। एक तरह से इस फिल्म को उसी तरह मान्यता मिल गई है, जिस तरह से बिल गेट्स, जुकरबर्ग, विराट कोहली, महेंद्र धौनी के अलावा देश-विदेश के लोगों के प्रचार से नीम किरौली बाबा के चमत्कारों को। यहां तक कि सरकार ने भी कोसी कोट्यां तहसील का नाम भी ‘कैंची धाम’ कर दिया।
‘हनुमान अंश’ के आलोक में उत्तराखंड के सिनेमा पर भी बात की जा सकती है। पिछले एक-दो साल में देशभर में अपने-अपने लोक देवताओं और नायकों पर फिल्म बनने का ट्रेंड चला है। साउथ में नई तकनीक और विषयवस्तु के साथ कई फिल्में आई हैं, जिनका हिंदी और अन्य भाषाओं में डबिंग हुई है। कन्नड़ में एक फिल्म आई- ‘कंतारा’। इस फिल्म ने लोककथाओं के उस अगाध समुद्र में गोता लगाया जहां हम अपनी पारंपरिक और गहरी सांस्कृतिक जड़ों को ढूंढ सकते हैं। मनुष्य ने किस तरह से अपनी प्रकृति, परिवेश, संस्कृति को बचाने के लिए अपने देवता गढ़े। उसके देवता कभी सार्वभौमिक नहीं हैं, उसी जमीन से हैं जहां उसकी रोज देवताओं से बातचीत होती है। लोकविधाओं में इतनी समृद्ध चीजें होती हैं कि वह लोक साहित्य, संगीत, कला, भाषा और इतिहास को बहुत अनौपचारिक तरीके से संबोधित कर सकती हैं।
साउथ की दूसरी फिल्म थी- ‘बाहुबली।’ राजमौली द्वारा निर्देशित यह फिल्म तेलगू और तमिल दोनों भाषाओं में शूट की गई थी। बाद में यह हिंदी, मलयालम और कन्नड भाषाओं में भी रिलीज की गई। इस फिल्म में भी दक्षिण के लोक की गहरी समझ को एक कहानी के रूप में रखा गया। यह भी फिल्मों के हमारे लोक का सुंदर प्रकटीकरण है। इन दोनों फिल्मों ने न केवल भारी व्यावसायिक सफलता प्राप्त की, बल्कि भारत जैसे भौगोलिक बहुलता और सांस्कृतिक विविधता वाले देश के लोगों को अपनी-अपनी लोक संस्कृतियों, विशेषकर लोकविधाओं को समझने के लिए प्रेरित किया है। इनके अलावा भी देश-विदेश में इस तरह की फिल्मों को लोकप्रियता मिल रही है।
‘हनुमान अंश’, ‘कंतारा’ और ‘बाहुबली’ फिल्मों के आने के बाद निश्चित रूप से उत्तराखंड के सिनेमा जगत ने भी इस तरह के प्रयोग करने का सोचा होगा। यह सुखद है कि अभी ‘हिमाद्रि प्रोडक्शंस’ ने लोक-आख्यानों पर आधारित फिल्मों की श्रृंखला बनाने का बड़ा जोखिम उठाया है। ‘हिमाद्रि प्रोडक्शंस’ ने ‘बाला गोरिया’ नाम एक फिल्म बनाई है। यह फिल्म अक्टूबर महीने में देशभर के सिनेमा घरों में प्रदर्शित होने जा रही है। यह फिल्म उल्लिखित फिल्मों की तरह न केवल लोक आख्यानों पर आधारित है, बल्कि यह उसी तरह नई उच्च तकनीक और नये फार्मेट पर आने वाली उत्तराखंड की पहली फिल्म होगी। उत्तराखंड के लोक आख्यानों में जिस तरह से लोक देवताओं और उनके आम जीवन से जुड़े संदर्भ गहरे तक दिखाई देते हैं, वह बताता है कि यहां के लोगों ने देवता भी अपने बीच के ही गढ़े हैं। उनकी निर्भरता कभी सार्वभौमिक देवताओं से नहीं रही। छोटे थानों में रहने वाले थानवासियों ने कब देवता का रूप ले लिया किसी को पता भी नहीं चला। वे अपनी जागर, बैसी, छमासी के साथ रोज अपनी जनता के साथ खड़े रहते हैं। उनकी भाषा और सरोकार आम लोगों जैसे ही हैं। गोलज्यू, गंगनाथ, सैम, हरज्यू, ऐड़ी, कालू, कलबिष्ट, कालछिन, छुरमल, झांकरसैम, डांडानागराजा, घंडियाल, कंडोलिया, जिया राणी से लेकर बड़ी संख्या में लोक में अपने-अपने देवता हैं। गांवों और परिवारों के भी अपने देवता हैं। भूमि, पशुओं के भी देवता हैं। इन सबकी कहानियां एक तरह से समाज में बदलाव लाने की और अन्याय के खिलाफ प्रतिकार हैं। इन देवताओं की प्रेम कहानियां हैं तो बहुत छल-कपट से मारे जाने के आख्यान भी हैं। कुल मिलाकर यह सब लोक के रक्षक और प्रतिपालक हैं।
लोक की इस विशेषता को समझते हुए ‘हिमाद्रि प्रोडक्शंस’ के संयोजक मनोज चंदोला ने अपने लोक आख्यानों में वर्णित लोक देवताओं पर फिल्मों की एक सिरीज बनाने की हिम्मत की है। इसके पहले चरण में उत्तराखंड के सबसे मान्य न्याय और भूमि देवता गोलज्यू के जीवन पर आधारित फिल्म ‘बाला गोरिया’ लगभग बनकर तैयार है। इस श्रृंखला की पहली फिल्म गोलज्यू के बाल जीवन पर आधारित है। यह फिल्म कम से कम तीन भागों में आयेगी। इसके बाद अन्य लोक देवताओं पर भी इस तरह की फिल्में बनेंगी। इस फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह उत्तराखंड की पहली फिल्म होगी जो अपेक्षाकृत अन्य फिल्मों से भारी बजट की है। उत्तराखंड की यह पहली फिल्म होगी, जिसमें आधुनिक तकनीक बीएफएक्स और एआई जैसी उन्नत तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस फिल्म का निर्देशन नितिन तिवारी कर रहे हैं। फिल्म की विषयवस्तु, कहानी, गीत-संगीत, अभिनय, लोकोशन, लोकभाषा, तकनीक आदि को अन्तरराष्ट्रीय फिल्मों की तरह बनाने की कोशिश की गई है। इस तरह का प्रयोग निश्चित रूप से उत्तराखंड सिनेमा के लिए महत्वूपर्ण पड़ाव होगा।
‘हिमाद्रि प्रोडक्शंस’ के प्रोड्यूसर मनोज चंदोला ने वही काम किया है जो दक्षिण के सिनेमा जगत ने किया है। अपनी लोकथातियों को विश्व पटल पर ले जाने के लिए उसे उचित मंच प्रदान करने का। दक्षिण में ‘कंतारा’ और ‘बाहुबली’ को लोगों ने जिस तरह से अपनी लोकविधाओं का प्रकटीकरण माना है, क्या उसी तरह उत्तराखंड के लोग भी इसे इस रूप में नहीं ले सकते हैं! हमारे लोग देश-विदेशों में हैं। अपनी लोक संस्कृति के लिए बहुत काम भी कर रहे हैं। हमारे लोगों के पास अब किसी अच्छी पहल को सहयोग देने के लिए संसाधन और उचित मंच भी हैं। ‘बाला गोरिया’ एक निर्माता द्वारा बनाई जा रही फिल्म मात्र नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड के लोक की गहरी जड़ों को विश्व पटल पर दिखाने की पहल भी है। जिस तरह से साउथ के लोगों ने अपनी लोककथाओं को पहुंचाने में इन दोनों फिल्मों और ‘हनुमान अंश’ को इतना लोकप्रिय बनाने में उनके भक्तों ने सहयोग किया है, क्या यह संभव नहीं है कि अपने लोक आख्यानों पर बन रही ‘बाला गोरिया’ के साथ भी ऐसा कर सकते हैं। अगर ऐसा हो सकता है तो अपने लोक के लिए यह भी एक समर्पण होगा।






