जब लगातार बारिश होती है तो गांव गहरी नीद में नही सोते हैं, सिर्फ करवट बदलते हुए रात काटते हैं। अभी रात का दो ढाई बजा होगा कि गांव में उठे शोर ने मधुली आमा की बेचैनी बढा दी, बुआरियां भी शोर सुनकर उठी तो नातिनी और पोता कैसे सोये रहते । दोनों अपनी अपनी ईजाओं की गोद में ऐसे चिपके जा रहे थे कि कोई उनको ईजाओं से छीन ना ले। मघुली आमा से रहा नहीं गया तो तीन शैल वाली बडी टार्च पकड़ कर तालमो की उस बखाई में जा पहुची जहां से शोर उठ रहा था।
अड़ौस पड़ौस के लोग गोपिया के घर के पास इकट्ठा हो गये थे। गोपिया के घर के पास से बहने वाले गधेरे का पानी पलट कर गोपिया के आगन में घुस गया तो आगन बाडे़ सहित करेड़ी से लगा गोठ मलुवे में बदल गया था। गोठ में बंधी एक गाय एक बैल और चार बकरियां मलुवे में दब गए थे। जिस कमरे में गोपिया और उसका परिवार सोता था वह कभी भी डह जाने वाला था। घटना के बाद गोपिया के पास इकबटाये लोगों ने गोपिया का जो सामान बचाया था वह सामान भी भीग कर खराब ही हो रहा था।
आमा ने गोपिया की बुआरी को आदेश जैसा दिया कि वह अपने बच्चों को लेकर मेरे घर चली जाये। गोपिया की बुआरीके पास आमा की बात मानने के अलावा और कोई चारा नहीं भी नही था। गोपिया समझ न्हीं पा रहा था कि क्या करे। इकबटायें बिरादर लोग भी समझ नहीं पा रहे थे कि गोपिया का घर कैसे बचे। आमा ने अनुभवी अनदाज में इतना कहा कि मनाखियों जो हूण छी है गो, द्यो थामण है बेर पैल्ली केवल चै रूणा अलावा के लै नि है सकन । जो सामन भितेर बे निकाल राखों उकें भल जाग धर दिओ, भो उजाव हूण बाद जो होल तब होल।
लोगों के पास भी आमा की बात मानने के अलावा कोई चारा नहीं था। अभी यह बात चल ही रही थी कि मकान का सामने वाला हिस्सा भर भरा कर बैठ गया , गोपिया का सामन पड़ोस के एक गोठ में रखवाने के बाद आमा गोपिया को लेकर अपने घर आ गई ।
उस रात गांव में सायद ही कोई सो पाया होगा । सुबह जब उजाला हुआ तब तक गोपिया का पूरा मकान मलुवे के ढेर में बदल चुका था। दोपहर तक गांव प्रधान पटवारी को लेकर आया तो सही पर पटवारी भी क्या कर सकता था घटना की रिपोट तहसील में भेजना ही तो उसका काम था।
गोपिया के परिवार को आमा के घर में शरण मिली हुई थी तो गांव के लोग भी आमा के घर पर ही इकट्ठे होते रहे। सभी को एक ही चिन्ता थी कि गोपिया अब कहां रहेगाए क्या खायेगा। प्रधान बार बार फोंस हांण रहा था कि चिन्ता मत करो सरकार से मदद दिलवाऊंगा, पर अभी क्या करना है करके प्रधान के पास भी कोई उपाय नहीं था। आमा सायद सोच चुकी थी कि आगे क्या करना है, इसी लिये आमा ने गेपिया की कुशल पात जानने आये लोगों से सवाल किया कि तुम सब जणि यदि हां कूछां तो ब्याल जाने गोपिया लिजी इन्तजाम है सकूं ! सभी के हां में सिर हिले तो आमा ने अपनी गोठ में सम्हाल कर रखे पुराने टिन और बल्लियां बाहर निकलवाई और नजदीक ही खाली पडी़ बेनाप जमीन पर गोपिया के लिये टिन कच्चा घर बनने लगा।
जब घर बन रहा था तब घटना की तसदीक करने तहसील दार भी पहुच गये। तहसील दार यह तो मान रहा था कि घटना में गोपिया का मकान पूरी तरह से ध्वस्त हो गया है और जानवर मलुवे में दब गये हैं, पर तहसील दार को यह राश नही आ रहा था कि गोपिया बेनाप में कैसे बैठ रहा है। आमा ने तहसील दार को दो टूक शब्दों में उत्तर दिया कि गों मैशनल जो करण छी कर हैलो, तुम जो कर सक छा करो, जो लै होल देखिनी रौल।
तहसीलदार के जाते जाते आमा ने यह भी बोल दिया कि मैं भोल डी एम थे भेंट करुंल ।
प्रधान जानता था कि आमा ने बोल दिया है तो वो डी एम से मिलने जायेगी जरूर । आमा की डीएम से मिलने की घोषणा के बाद प्रधान के माथे में सिलवटें उभर आई थी। आखिर प्रधान ने ही तो गधेरे में पत्थर तोड़ने की खान लगाई थी। अगर गधेरे के पत्थर नहीं टूटते तो गधेरे का पानी तो अपने रास्ते जा ही रहा था।






