हमें ऐसा निवेश नहीं चाहिए जिसमें पहाड़ की जमीन जाए, हमारे लोग बर्तन धोएं और मुनाफा बाहर के धन्नासेठ कमाएं
उत्तराखंड में इन दिनों सरकारी जमीन को निवेश और व्यावसायिक परियोजनाओं के लिए नीलाम करने की तैयारी चल रही है। करीब 7000 बीघा सरकारी जमीन को UIIDB (उत्तराखंड इन्वेस्टमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड) के माध्यम से बड़े होटल, रिसोर्ट, वेलनेस सेंटर आदि के उपयोग के लिए दी जा रही है।
इस पर सवाल उठाना क्या निवेश का विरोध है? बिल्कुल नहीं। उत्तराखंड को निवेश चाहिए। बहुत निवेश चाहिए। रोजगार चाहिए, उद्योग चाहिए, पर्यटन चाहिए, आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं चाहिए, शिक्षा चाहिए और मजबूत अर्थव्यवस्था चाहिए।
लेकिन सवाल यह है कि निवेश किसके लिए होगा? क्या ऐसा निवेश चाहिए जिसमें उत्तराखंड की जमीन सरकार दे, पहाड़ के प्राकृतिक संसाधन इस्तेमाल हों, सड़क और दूसरी बुनियादी सुविधाएं जनता के पैसे से विकसित हों, स्थानीय युवा उन परियोजनाओं में नौकर बनें और अंत में करोड़ों-अरबों का मुनाफा किसी बड़े कॉरपोरेट के खाते में चला जाए?
अगर यही निवेश मॉडल है तो हमें ऐसा निवेश नहीं चाहिए। हमें ऐसा निवेश चाहिए जो उत्तराखंड के लोगों को आर्थिक रूप से मजबूत करे। आज सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर सरकार के पास हजारों बीघा जमीन उपलब्ध है तो उसका पहला अधिकार बड़े पूंजीपतियों का क्यों होना चाहिए?
सरकार चाहे तो यही जमीन स्थानीय युवाओं को दे सकती है। स्थानीय उद्यमियों को दे सकती है। महिला स्वयं सहायता समूहों को दे सकती है। सहकारी समितियों को दे सकती है। गांव के लोगों को सामूहिक रूप से पर्यटन परियोजनाएं विकसित करने का अवसर दे सकती है।
एक गांव के 20-30 युवा मिलकर अपना होटल चला सकते हैं। होमस्टे क्लस्टर बना सकते हैं। ट्रेकिंग और एडवेंचर कंपनियां बना सकते हैं। कैफे, स्थानीय उत्पादों के स्टोर, फूड प्रोसेसिंग यूनिट और ट्रांसपोर्ट कंपनियां चला सकते हैं।
सरकार जमीन, सस्ती पूंजी, प्रशिक्षण, तकनीक और बाजार उपलब्ध कराए और मालिक पहाड़ का युवा बने। लेकिन अगर जमीन सरकार की हो और मालिक कोई बाहर का बड़ा कारोबारी बने, जबकि पहाड़ का युवा केवल नौकर बनकर रह जाए, तो फिर हमें पूछना पड़ेगा इस विकास में उत्तराखंड का हिस्सा आखिर कितना है?
हमें ऐसा पर्यटन नहीं चाहिए जिसमें पहाड़ का युवा होटल में बर्तन धोता रहे और बाहर से आया कारोबारी पहाड़ की जमीन पर करोड़ों कमाकर वापस चला जाए। हमें ऐसा पर्यटन चाहिए जिसमें पहाड़ का युवा होटल का मालिक बने।
पहाड़ की महिला अपने उत्पाद बेचे। पहाड़ का किसान अपने खेत की उपज होटल तक पहुंचाए। पहाड़ का टैक्सी चालक पर्यटक को घुमाए। पहाड़ का स्थानीय गाइड पर्यटकों को हिमालय की कहानी सुनाए। पहाड़ के कारीगर अपने उत्पाद बेचें। और पर्यटन से पैदा होने वाला पैसा गांव की अर्थव्यवस्था में घूमे। यही वास्तविक आर्थिक विकास है।
दूसरा और उससे भी बड़ा सवाल है सरकारी जमीन आखिर बची कितनी है? पहाड़ में जमीन कोई असीमित संसाधन नहीं है। पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियां अलग हैं। यहां एक जमीन का टुकड़ा आज भले खाली दिखाई दे, लेकिन कल वही जमीन अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, नर्सिंग कॉलेज, विश्वविद्यालय, स्कूल, खेल मैदान, प्रशासनिक भवन या आपदा के समय पुनर्वास के काम आ सकती है।
आज हम जमीन को 90 साल के लिए किसी व्यावसायिक परियोजना को दे देंगे और कल जब हमारी आने वाली पीढ़ियां पूछेंगी कि अस्पताल बनाने के लिए जमीन कहां है, स्कूल के लिए जमीन कहां है, मेडिकल कॉलेज के लिए जमीन कहां है, तब सरकार के पास क्या जवाब होगा?
क्या आने वाली पीढ़ियों की जरूरतों से बड़ी आज की कोई निवेश परियोजना हो सकती है? सरकारी जमीन सरकार की निजी संपत्ति नहीं है। यह जनता की संपत्ति है। सरकारें आती-जाती हैं। मुख्यमंत्री बदलते हैं। मंत्री बदलते हैं। अधिकारी बदलते हैं। लेकिन जमीन रहती है। इसलिए किसी भी सरकार को यह अधिकार नहीं होना चाहिए कि वह आने वाली कई पीढ़ियों के हिस्से की जमीन को केवल आज के निवेश के आंकड़े दिखाकर निजी व्यावसायिक हितों के हवाले कर दे।
और सवाल सिर्फ जमीन का नहीं है। सवाल पहाड़ के भविष्य का है। आज पहाड़ों में बड़े-बड़े होटल, रिसॉर्ट, लग्जरी प्रोजेक्ट और दूसरी व्यावसायिक परियोजनाओं की होड़ लगी हुई है। क्या हम पहाड़ को इसी दिशा में ले जाना चाहते हैं? हर खूबसूरत पहाड़ी को रिसॉर्ट में बदल देना विकास नहीं है। हर नदी के किनारे कंक्रीट खड़ा कर देना विकास नहीं है। हर जंगल और प्राकृतिक क्षेत्र के आसपास होटल बना देना पर्यटन नहीं है।
हिमालय कोई रियल एस्टेट प्रोडक्ट नहीं है। जिस हिमालय की भव्यता देखने के लिए दुनिया भर से लोग आते हैं, अगर उसी हिमालय को कंक्रीट के जंगलों से ढक दिया जाएगा तो आने वाली पीढ़ियों को हम क्या देंगे? पहाड़ की पहचान प्रकृति है। पहाड़ की पहचान गांव हैं। पहाड़ की पहचान संस्कृति है। पहाड़ की पहचान खेत हैं। पहाड़ की पहचान जंगल और जलस्रोत हैं। पहाड़ की पहचान उसकी सादगी है।
अगर इसी सबको खत्म करके हम बड़े-बड़े लक्जरी रिसॉर्ट और अय्याशी के अड्डे खड़े करने लगेंगे तो कुछ समय बाद पर्यटक यहां पहाड़ देखने नहीं, पहाड़ में बने कंक्रीट के शहर देखने आएगा।
क्या यही उत्तराखंड का सपना है? नहीं। हमें विकास चाहिए, लेकिन ऐसा विकास चाहिए जो हिमालय को बचाए और पहाड़ के लोगों को मजबूत करे।






