अप्रैल 2019 में निर्मल पुरजा ने एक ख़ास तरह की स्याही बनवाई. स्याही में उसने अपने माता-पिता, भाई-बहनों और अपनी पत्नी के बालों से निकलवाया गया डीएनए भी मिलवाया. वह एक असंभव अभियान पर निकलने वाला था. इस स्याही का इस्तेमाल उसने अपनी पीठ पर एक बड़ा सा टैटू गुदवाने में किया जिसमें चौदह पर्वत शिखरों की आकृतियाँ उकेरी गयी थीं.
उसका मानना था कि वह जिस अभियान पर निकल रहा था वह एक ऐसी आध्यामिक यात्रा होने जा रहा था जिस पर उसके वे परिजन कभी नहीं जा सकते थे. उसे लगता था कि उसकी पीठ पर उकेरा गया उसके परिजनों का डीएनए उसे बार-बार अहसास दिलाता रहेगा कि उसका एक परिवार है जो हर वक़्त उसकी बाट जोहता रहता है. कि बहुत अधिक दुस्साहस का परिणाम उसकी मौत भी हो सकता है जो उसके घरवालों के लिए एक असहनीय त्रासदी होगा.
निर्मल पुरजा को संसार ने निम्स दाई के नाम से जाना. नेपाली भाषा में दाई का मतलब होता है बड़ा भाई.
जिस अभियान का ऊपर ज़िक्र किया गया, उस वक़्त वह सचमुच असंभव लगता था. निर्मल रेकॉर्ड समय में संसार के उन सभी चौदह पर्वत-शिखरों पर चढ़ने की मंशा रखता था जिनकी ऊंचाई 8000 मीटर से अधिक है. ये सभी शिखर हिमालय और काराकोरम श्रृंखलाओं में स्थित हैं.
पर्वतारोहण की भाषा में 8000 मीटर से अधिक ऊंचाई को डैथ-ज़ोन कहा जाता है. ऑक्सीजन की खतरनाक कमी की वजह से इस ऊंचाई पर हर पल जान जाने का भय बना रहता है. इन सभी चोटियों को सबसे पहले इतालवी पर्वतारोही राइनहोल्ड मेसनर ने 1986 में फतह किया था. पोलैंड के महान येरज़े कुकुज़्का इस कारनामे को करने वाले दूसरे थे. ऐसा करने में मेसनर को सोलह बरस लगे थे जबकि कुकुज़्का ने ऐसा आठ साल से कम समय में कर दिखाया. फिर दक्षिण कोरिया के किम चांग-हो ने इस रिकॉर्ड को केवल लगभग एक महीने के अंतर से बेहतर किया. यह और बात है कि महान कुकुज़्का की उपलब्धि एक बिल्कुल अलग स्तर की थी. अपने पूरे पर्वतारोहण करियर में उन्होंने दस दफ़ा नए रास्तों से इन चोटियों पर चढ़ाई की.
निर्मल पुरजा ने आधुनिक पर्वतारोहण को पूरी तरह बदल डाला था. वे ऐसी गति से पहाड़ों पर चढ़ते थे जैसा इतिहास में किसी ने नहीं किया था. उनके साथ नेपाली पर्वतारोहियों की एक असाधारण टीम भी होती थी. उस साल यानी 2019 में उन्होंने अपने प्रोजेक्ट पॉसिबल के तहत उन सभी चौदह चोटियों का फ़क़त 6 महीने और 6 दिनों में पूरा कर दिखाया. उन्होंने एक इतनी गहरी लकीर खींच डाली जिसे मिटा सकने के लिए महामानवीय साहस की ज़रूरत पड़ेगी.
उनके आने के बाद से पर्वतारोहण का इतिहास नई इबारत के साथ लिखा जाना शुरू हुआ. पर्वतारोहण की जोखिमभरी कहानियों में लंबे समय तक नेपाली पर्वतारोही और शेरपा पृष्ठभूमि के पात्र बने रहते थे. वे किसी विदेशी पर्वतारोही के सहायक की भूमिका में रहा करते थे – यही वजह है कि एवरेस्ट को सबसे पहले फ़तेह करने वाले एडमंड हिलेरी माने जाते हैं, तेनजिन नोर्गे नहीं.
निर्मल पुरजा यानी निम्स दाई ने अपने देश को विश्व पर्वतारोहण के केंद्र में ला खड़ा किया. वर्ष 2021 में उन्होंने नौ अन्य नेपाली पर्वतारोहियों के साथ के 2 का पहला शीतकालीन आरोहण किया. सभी दस पर्वतारोही नेपाल का राष्ट्रगान गाते हुए एक साथ शिखर पर पहुँचे. उल्लेखनीय यह भी है कि उस अभियान में निम्स ने बिना ऑक्सीजन के चढ़ाई पूरी की. दृढ़-इच्छा वाले इस जांबाज़ इंसान ने दुनिया भर के सोशल मीडिया में अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल की और वे युवाओं के बीच सबसे अधिक जाने जाने वाले पर्वतारोही बन गए.
बेहद गरीब नेपाली पृष्ठभूमि से आए इस योद्धा के जीवन और उसकी उपलब्धियों को अपने तमाम दोस्तों की तरह मैंने भी बड़ी हौस और प्रसन्नता के साथ फॉलो किया. 2019 के उनके कारनामे की विस्तृत झलक नेटफ्लिक्स पर मौजूद डॉक्यूमेंट्री ’14 पीक्स – नथिंग इज इम्पॉसिबल’ में देखा जा सकता है.
पर्वतारोहियों के साथ ऐसा कभी नहीं होता एक बार किसी पहाड़ को चढ़ लेने के बाद उसका आकर्षण कम हो जाए. वे बार-बार उन्हीं के पास वापस लौटते हैं. इस साल की शुरुआत तक निम्स दाई ने सात बार एवरेस्ट की चढ़ाई कर ली थी. दो माह पहले यानी 27 मई को उन्होंने आठवीं बार यह कारनामा कर दिखाया था.
कोई दस दिन पहले वे काराकोरम पर्वत की ब्रॉड पीक के अभियान पर निकले. 8051 मीटर ऊंची इस चोटी पर वे जुलाई 2019 में चढ़ चुके थे. उनके साथ चार नेपाली पर्वतारोहियों के साथ पांच और सदस्य थे जो पाकिस्तान, अमेरिका, ओमान और चीन से आए थे.
30 जुलाई की सुबह उनका अभियान करीब 6100 मीटर की ऊंचाई पर था जब उसके सारे सदस्य एक भयंकर हिम-स्खलन की चपेट में आ गए. अभियान के किसी भी सदस्य के प्राण न बच सके.
पीठ पर खुदा हुआ परिवार का डीएनए इस दफ़ा निम्स दाई को रास्ता दिखाने में कामयाब न हो सका. पाँच दिन पहले वह कुल 43 बरस का हुआ था.
इस हादसे से दुखी राइनहोल्ड मेसनर ने, जिन्हें आज तक का महानतम पर्वतारोही कहा जाता है, कहा, “निर्मल ने साहस और जुनून के साथ अपना रास्ता ख़ुद चुना. उसके जाने के बाद केवल उसके जाने का दुःख ही नहीं बचा रह गया है बल्कि उस जीवन की स्मृति भी रह गई है जिसे उसने सचमुच पूरे अर्थों में जिया.”
आने वाली कितनी ही पीढ़ियाँ इस असाधारण इंसान की उपलब्धियों को हैरानी और अविश्वास के साथ देखती रहेंगी. अलविदा निर्मल!
अशोक पाण्डेय





