इंसान होना एक खासा अनुभव है। उसके दिमाग की हरकत, उस दिमाग का पूर्वाग्रही या संस्कारों से भर जाना, या फिर अनकंडीशंड हालात में सुकून पाना और मर जाना—यह सब अपने आप में एक रहस्य है।
अगले जन्म में अगर मैं जानवर या वनस्पति बना और अभिव्यक्ति का हुनर कायम रहा, तो आदमी के दिमाग के किस्से बड़े रस लेकर सुनाऊँगा।
बुढ़ापे में आदमी अल्ज़ाइमर का शिकार होकर असहाय हो जाता है। इन्द्रियाँ बदहाल हो जाती हैं। कहाँ पाँव गिर रहे हैं, कहाँ से आवाज़ आ रही है, क्या कहा जा रहा है और वह क्या सुन रहा है—ऐसे हालात हो जाते हैं। पर ऐसे में भी मैंने कुछ विद्वान, कर्मठ बूढ़ों के रुतबे का हुनर हरा-भरा देखा है। हालाँकि आँखें कमजोर होकर मिचमिचा रही हैं, हाथ काँप रहे हैं, पर अभी भी उनकी खोज और अभिव्यक्ति में युवाओं के हार्मोनों जैसा प्रवाह और रस है। यदि उनकी किताबें पढ़ेंगे तो उनमें एक प्रवाह, दुलार और लहरों-सी ताज़गी महसूस करेंगे।
डा प्रयाग जोशी को इंटर के बाद ही उन्हें शोध और श्रम की दीवानगी लग गई। पं. उमाकांत शास्त्री की मलैनाथ में सुनाई गई श्रीमद्भागवत को सुनकर उन्हें संस्कृत शोध और विश्लेषणात्मक खोज का चस्का लगा।
इतिहास मैंने कम पढ़ा है। मैं अल्पज्ञ हूँ। उसकी समझ और उलझी हुई तारीखों को याद रखना मेरे बस का नहीं।
पर उत्तराखंड में इतिहास पर लिखने वाले तीन जुझारू योद्धा ऐसे हैं, जिनका लिखना और खोज का जज़्बा आज भी चेतना के साथ जागृत है—डा. ताराचन्द्र त्रिपाठी, डा. रामसिंह और डा. प्रयाग जोशी।
अभी हाल ही में डा. प्रयाग जोशी की दो किताबें आई हैं—‘उत्तराखंड का इतिहास : द्युतिवर्मन से यशोवर्धन तक’ और ‘सीरा के मल्ल राजवंश का इतिहास’। इनमें पुरू पंत, सीरा के मल्ल राजाओं तथा अकबर काल के कुमाऊँ के महान योद्धा और ज्ञानी रुद्रचन्द्र का इतिहास है। क्या लावण्य है, क्या सीख है! उन्होंने अल्मोड़ा में कुमाऊँ राज्य को स्थापित किया और साथ ही संस्कृत साहित्य की भी रचना की। योद्धा पुरू पंत की यशोगाथा भी इसमें है, जिसने मल्ल राज्य को समाप्त कर रुद्रचन्द्र के साम्राज्य का विस्तार किया।
यह सब पढ़कर यही लगता है कि आदमी की हरकत और दिमाग की संरचना हर युग में लगभग एक-सी रही है। वह भला भी है, क्रूर भी है, संघर्ष के खेल में सर्वविजेता भी है और हारा हुआ भी।
आज की राजनीति और विगत की राजनीति में कहीं कोई फर्क नहीं है। वही धन-दौलत, विस्तारवाद की इच्छा और दूसरों को कब्जाने की कीमत। यश और कीर्ति के लिए बाहुबली, युद्धबली और संगठनात्मक नैतिकता वाला आदमी चाहिए, जो मानसिक और शारीरिक रूप से खास हो। बाकी, जिनमें यह सब नहीं है, वे याचिकाकर्ता और जी-हुजूरी करने वाले बनकर इन दिग्गजों के अनुगामी हो जाते हैं।
‘वीर भोग्या वसुंधरा’ का विचार आज भी सजग है। अब यह वीरता बाहुबल से ही नहीं, बुद्धि और चिंतन से भी हो सकती है। अपने को स्थापित करने के लिए दिमाग में ‘एस्टैब्लिशमेंट’ होना चाहिए। यही दिमागी विवेक सत्ता, शिक्षा, संस्कृति और समाज को चलाता है। भूगोल इन खास डीएनए वाले इंसानों को अवसर भी देता है और जीवन भर के लिए एक ठोस रणनीति भी, जिसके सहारे वे जीवन को ढोते या गतिमान करते हैं।
प्रयाग जोशी के हर लेखन में लोच है, प्रवाह है और एक युवा-सी सजगता तथा गज़ब की श्रमशीलता है। ‘लगे रहने’ का उनमें जज़्बा पिच्यासी वर्ष की आयु में भी बदस्तूर कायम है।
हर उत्तराखंडी को उत्तराखंड को समझने के लिए उन्हें पढ़ना चाहिए।
वह कहते हैं कि आज कुमाऊँ में परम्पराएँ और संस्कृति लुप्त होती जा रही हैं, पर गढ़वाल में ‘धाद’ जैसी पत्रिकाएँ अपनी गढ़वाली बोली के विकास के लिए अनवरत कार्य कर रही हैं।
कुलदेवी जियारानी पर उनका काम हो, वन राजियों पर शोध हो, या फिर जौनसार-बावर और बंगाण पर उनका अध्ययन—आप पढ़ेंगे तो उत्तराखंड के दिल की धड़कन का अंदाज़ आएगा।
उनके लेखन में भूगोल है, इतिहास है, समाजशास्त्र है और उसका मनोविज्ञान भी है, जिसे उन्होंने कविता की तरह लिखा है।
उत्तराखंड के इतिहास में वह लिखते हैं—“…इसलिए उत्तराखंड के अध्ययन की स्रोत सामग्री ये सभी मानवीय जातियाँ हैं। इनके दिक्काल को युधिष्ठिर संवत के छत्तीस वर्ष पूर्व की तिथि माना गया है। ईसा के वर्षों के मानक में यह तिथि तीन हजार दो सौ बयालिस ईसा पूर्व बैठती है…।”
उनकी पुस्तकें बतलाती हैं कि किस लगन और मेहनत से अंग्रेज अफसरों ने हमारे पहाड़ की अघोषित और अनडॉक्यूमेंटेड भूमि की पैमाइश की तथा जीवन के हर क्षेत्र के ज्ञान के लिए गहरे अध्ययन किए।
आज भी उत्तराखंड के शोधकर्ता इनके अध्ययन के बिना आगे नहीं बढ़ सकते, चाहे उनका विषय कोई भी हो।
वह अपनी किताबों में महाभारत को बहुत उद्धृत करते हैं। उनके हिसाब से उत्तराखंडी सारे वंशों और वर्णों की मिश्रित रचनाएँ हैं—अपनी संस्कृति में भी और अपनी सोच में भी।
लड़ाइयाँ, चाहे आज की हों या पहले की, मूलतः वही जियोपॉलिटिक्स और आदमी के अपने को स्थापित करने का खेल हैं।
आज केवल अस्त्र-शस्त्र या ताकतवर सेना से ही विजय प्राप्त नहीं की जा सकती। उसके लिए छल, छद्म और तकनीक का हुनर चाहिए। अपनी पुस्तक ‘सीरा के मल्ल राजवंश’ में वह लिखते हैं कि पुरू पंत ने रुद्रचंद के कहने पर अपने शत्रुओं को परास्त करने के लिए अपनी नानी से युक्तियाँ सीखीं और पानी को भी हथियार की तरह इस्तेमाल किया। गुबरैले के आशावान और लगातार प्रयासों को देखकर उन्हें बार-बार लड़ने-भिड़ने की प्रेरणा मिली।
आज भारत ने जिस तरह पाकिस्तान का पानी रोकने की रणनीति बनाई, उसी प्रकार की रणनीतियाँ अतीत में भी थीं। आज यदि कोई देश अपने हथियार मित्र देशों को बेचकर अपने विरोधी पक्ष को घेरने का प्रयास करता है, तो वह भी एक राजनीतिक टैक्टिक ही है। अपनी ताकत और हैसियत बढ़ाने के लिए खानदानी संबंध बनाए जाते थे; राजा प्रतिष्ठित घरानों में विवाह करते थे।
वह लिखते हैं—“वह दो दलों की ऐसी लड़ाई है, जिसमें पूरी फौज न लड़ाकर, दोनों के प्रतिनिधि पहलवान, हाथी, सेनापति या अफसरों को लड़ाकर हार-जीत का फैसला घोषित कर लिया जाता है। जिस दल का लड़ाका पसंद आता है, उसकी फौज की जीत और दूसरे की हार मान ली जाती है।”
अपने शीर्षक ‘बहुरूपिये जोगी के किस्से ही किस्से’ में वह पुरूखू पंत का वर्णन करते हैं, जो जोगी का रूप धारण कर युद्ध हारने के बाद अपनी नानी के आँगन में खड़े होकर “भीख नहीं, भूख” पुकारता है।
कटघर की लड़ाई में रुद्रचंद का ‘इक़फ़ा’ मुगलों की विशाल सेना से हुआ था। यह लड़ाई तराई-भावर प्रांत के लिए प्रतिवर्ष नौ लाख रुपये की आय के संदर्भ में लड़ी गई थी।
दिलचस्प अंदाज़ में लिखी ये किताबें आपको किसी जादू की तरह स्पर्श करेंगी। पढ़िए और देखिए कि क्या होता है! वैसे भी संजोया और साधा हुआ इतिहास ‘हम क्या हैं’ को समझने का आइना होता है और हमारे संघर्षरत बुज़ुर्गों का स्मरण भी।
रुचिकर पाठकों के लिए यह एक तोहफ़ा है।





