परसों उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने एक छात्र- युवा संवाद किया.
अखबारों ने इस छात्र- युवा संवाद की सबसे बड़ी विशेषता बताई कि मुख्यमंत्री इस कार्यक्रम में पैंट-शर्ट पहन कर आए थे !
कार्यक्रम में छात्र- युवाओं की उपस्थिति और उसके नाम से ऐसा लगा कि मुख्यमंत्री और राज्य सरकार छात्र- युवाओं से वाकई संवाद करना चाहते हैं, उनकी जरूरतें और अपेक्षाओं समझना चाहते हैं. लेकिन अब जो तस्वीर सामने है, उससे साफ है कि छात्र- युवाओं की अपेक्षाओं, जरूरतों और दिक्कतों से मुख्यमंत्री और सरकार का कोई ज्यादा सरोकार नहीं था ! वो तो केवल एक फोटो ऑप करना चाहते थे ताकि छात्र- युवाओं से निकटता प्रदर्शन का विज्ञापन हो सके.
लेकिन इस स्क्रिप्टेड कार्यक्रम की हवा एक बच्ची के सवाल ने निकाल दी. इस बच्ची ने कहा कि वो खिलाड़ी है, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर खेल चुकी है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने के पैसे मांगे जा रहे हैं.
कोई भी संवेदनशील मुख्यमंत्री होता तो तत्काल अफसरों को तलब करता, मामले की जांच करवाता और अगर बच्ची के आरोप में जरा भी सच्चाई होती तो तत्काल न केवल कार्यवाही करवाता बल्कि बच्ची के अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा में खेलने का इंतजाम भी सुनिश्चित करवाता.
लेकिन धाकड़- धुरंधर- हैंडसम धामी जी ने क्या किया ? पहले तो वे स्क्रिप्टेड आइडिया के बाहर के सवाल पर अचकचा गए और बच्ची की बात पर ठोस प्रतिक्रिया देने के बजाय इतना ही कह सके – चलो- चलो बेटा, अभी बैठ जाओ, कोई बात नहीं ! इतना प्रतिक्रियाहीन, संवेदना रहित, निरपेक्ष कोई कैसे हो सकता है, मुख्यमंत्री जी !
अब देख रहे हैं कि उसी बच्ची से एक सफाई का वीडियो जारी करवाया गया है ! यह आपके आदेश या मर्जी से हो रहा है, मुख्यमंत्री जी या आपके कारिंदे खुद ही फरमाबरदारी सिद्ध करने के लिए बच्ची को दबाव में ले आए ? जो भी हो, साफगोई से अपनी दिक्कत आपके सामने रखने वाली बच्ची पर इस तरह दबाव बना कर वीडियो डलवाना संवेदनहीन, शर्मनाक कृत्य है और यह एक डरी हुई हुकूमत के ही लक्षण हैं !





