बागेश्वर का राजनीतिक परिदृश्य- बीता हुआ कल आज और आने वाला कल

उत्तराखण्ड में बागेश्वर नाम की विधानसभा करीब 60 साल से आरक्षित विधानसभा की श्रेणी में डाली हुई है। यही एक बड़ी वजह भी है कि यहां राजनीतिक प्रतिद्वन्दिता नहीं के बराबर है। बागेश्वर विधानसभा राजनीतिक रूप से परिपक्व विधानसभा की तरह स्थापित नहीं है तो कारण राजनीतिक प्रतिद्वन्दिता नही के आसपास होना ही है।

आपातकाल के बाद जनता पार्टी की सरकार के दौरान हुए विधानसभा चुनाव में बागेश्वर विधानसभा से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में पूरन आर्या ने यह सीट जीती तो थी लेकिन पूरन आर्या के पहले और बाद में इस सीट पर कांग्रेस और भाजपा का ही वर्चस्व रहा है।

बागेश्वर विधानसभा के नाम से जाने जाने वाली इस सीट को आरक्षित विधानसभा घोषित किए जाने के बाद कांग्रेस पार्टी के लिए सरस्वती टम्टा, गोपाल रामदास, राम प्रसाद टम्टा तथा भारतीय जनता पार्टी के लिए नारायण रामदास बागेश्वर विधानसभा में चुनाव जीतकर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में प्रतिनिधित्व किए थे।

उत्तराखंड राज्य बनाने के बाद वर्ष 2002 में जब राज्य का पहला चुनाव संपन्न हुआ तब कांग्रेस के रामप्रसाद टम्टा ने भारतीय जनता पार्टी के नारायण नारायण रामदास को हराकर अस्थाई राजधानी देहरादून में बागेश्वर का प्रतिनिधित्व किया। वर्ष 2007 में राम प्रसाद टम्टा कांग्रेस की ओर से प्रत्याशी घोषित किए गए तो कांग्रेस के ही एक दमदार नेता चंदन रामदास जो कांग्रेस पार्टी में राज्य स्तरीय अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ के अध्यक्ष भी थे ने कांग्रेस को अलविदा कहा और भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें गोदी में बैठाकर विधानसभा का टिकट सौंप दिया।श्री दास ने राम प्रसाद टम्टा को थोड़े से अंतर से हराकर देहरादून विधानसभा में अपने लिए वह स्थान बना लिया कि जीवन पर्यंत बागेश्वर विधानसभा जीतते रहे।

हार जीत की इस कड़ी में वर्ष 2012 में कांग्रेस की ओर से पुनः राम प्रसाद टम्टा को कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी बनाया था जो फिर से छोटे से अंतर से चुनाव हारे। वर्ष 2017 में कांग्रेस ने रामप्रसाद टम्टा को किनारे कर दिया और एक नए चेहरे बालकृष्ण को मैदान में उतारा। बालकृष्ण बहुत बुरी तरीके से चुनाव हारे। वर्ष 2012 में कांग्रेस ने पुराने कांग्रेसी गोपाल रामदास जी के पुत्र रंजीत दास को मैदान में उतारा । रंजीत दास भी बहुत बड़े अंतर से चुनाव हारे और चंदन रामदास तीसरी बार विधानसभा में पहुंच गए।

बहुत अधिक अस्वस्थता के रहते श्री दास तीसरी बार आधा ही कार्यकाल पूरा कर सके और उनका देहांत हो गया। श्री दास के देहांत होने के बाद मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस ने बसंत कुमार को मैदान में उतारा । बसंत कुमार मात्र 2400 वोटों से यह चुनाव हार गए और श्री चंदन रामदास की धर्मपत्नी पार्वती दास चुनाव जीत तो गईं लेकिन बसंत कुमार ने बता दिया कि वही एकमात्र कार्यकर्ता है जो कांग्रेस के लिए लाभ का सौदा साबित हो सकते हैं ।

यहां बता दिया जाना चाहिए कि श्री बसंत कुमार पूर्व में तीन बार बसपा के टिकट पर भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़े और काफी अच्छे मत प्राप्त किए । वर्ष 2022 में श्री बसन्त कुमार ने बहुजन समाज पार्टी को अलविदा बोला और आम आदमी पार्टी के प्रत्याशी की हैसियत से बागेश्वर में ताल ठोकी तथा 10000 मत प्राप्त कीजिए।

यदि हम विकास को आईना माने तो राम प्रसाद टम्टा ने अपने कार्यकाल में जो विकास बागेश्वर विधानसभा के अंतर्गत किया उस विकास को कपकोट विधानसभा में स्वयं भगत सिंह कोश्यारी जो मुख्य मन्त्री भी रहे हैं छू तक नहीं पाए, चंदन रामदास तो राम प्रसाद टम्टा द्वारा किए गए विकास की लाइन से कोषों पीछे अपने आप को खड़ा किये रहे।

यहां सबसे बड़ा सवाल यही पूछा जाता है कि जब राम प्रसाद टम्टा ने अपने आप को सच्चे विकास पुत्र के रूप में स्थापित कर लिया था तो वह चुनाव कैसे हार गए और अन्तिम समय में कांग्रेस को अलविदा क्यों किया।

इस सवाल की तहत तक पहुंचाने के लिए कांग्रेस पार्टी के अंदर की राजनीति को टटोलना होगा।
कांग्रेस पूरे देश में छत्रप आधारित पार्टी के रूप में स्थापित रही है । यह अलग बात है कि आज की तारीख में यदि कांग्रेस पूरे देश में गर्त में डूबी हुई है तो उसकी वजह भी कांग्रेस का छत्रप आधारित पार्टी होना ही है । देश के कई राज्यों में कांग्रेस ने अपने आप को छत्रपता की संस्कृति से बाहर निकालने की कोशिश की है और ऐसा करने का लाभ भी कांग्रेस को मिल रहा है । जहां तक उत्तराखण्ड का सवाल है तो यहां कांग्रेस आज भी छत्रप आधारित पार्टी ही है।

राज्य बनने के बाद सिर्फ राम प्रसाद टम्टा ही नहीं वरन् और भी बहुत सारे कांग्रेसी नेताओं ने छत्रपता को स्वीकार नहीं किया और छत्रपता से बाहर निकल कर स्वतंत्र सांसों के सहारे कांग्रेस की राजनीति को जन राजनीति के रूप में विकसित करने की कोशिश तो की लेकिन ऐसा साहस करने वाले नेता या तो दीन-हीन बन कर घरेलू हो गए या फिर कांग्रेस छोड़कर दूसरी पार्टी में स्थापित हो कर जनता के बीच अभी भी काम कर रहे हैं।

राजनीति में छत्रप संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि छत्रप को फर्क नहीं पड़ता कि उसकी पार्टी लगातार हार रही है और सत्ता से बाहर कर दी गई है। उसकी हर कदम पर यही कोशिष रहती है कि उसकी पार्टी में उससे सवाल पूछने वाला कोई व्यक्ति या कार्यकर्ता या नेता उसके ओरे धोरे खड़ा भी नहीं होना चाहिए।
किसी भी छत्रप के बराबर पहुंचने के लिये विधानसभा सदस्य, नगर पालिका अध्यक्ष या सदस्य, जिला पंचायत सदस्य या अध्यक्ष, ब्लाक प्रमुख के पदों को रास्ता बनाना होता है। उत्तराखंड में जिला पंचायतों, विधानसभाओं, नगर पालिकाओं, ब्लॉक प्रमुखों के पदों पर कांग्रेस बुरी तरीके से पिछड़ती जा रही है का राजनीतिक अर्थ यही है कि छत्रप सुरक्षित है।

हाल फिलहाल देश के अंदर सिर्फ कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी है जिसमें छत्रप अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं। यही वह मुख्य वजह भी है कि जो लोग कांग्रेस में तहसील स्तर पर जिला स्तर पर प्रदेश स्तर पर या देश के स्तर पर छत्रप के रूप में स्थापित हैं वे कांग्रेस पार्टी इसीलिए नहीं छोड़ते हैं कि दूसरी पार्टी में जाकर वे मुख्यमंत्री भी बन जाएंगे मंत्री भी बन जाएंगे लेकिन उनकी छत्रपता बरकरार नहीं रहेगी । इसमें कोई दो राय नहीं है कि उत्तराखंड की प्रत्येक लोकसभा विधानसभा जिला पंचायत नगर पंचायत की सीटों पर प्रत्याशी चयन में छत्रपता प्रभावी रूप से काम करती है।

उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी की अपनी कोई ठोस विचारधारा नहीं है और उसके पास राज्य को आगे ले जाने का रचनात्मक विजन भी नही है फिर भी भारतीय जनता पार्टी ताकत के रूप में स्थापित है तो मुख्य वजह कांग्रेस के अंदर की छत्रप संस्कृति को पहाड़ के लोग सहन नहीं कर रहे हैं।

पिछले ही दिनों कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने बागेश्वर जनपद के एक मंच में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए बताया कि यदि आज वे इस मंच में आप लोगों को संबोधित कर रहे हैं तो यह श्रेय सिर्फ हरीश रावत जी को जाता है।

प्रदेश अध्यक्ष के बयान के बाद एक बात तो साफ हो गई है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी में टिकट वितरण पर छत्रपों का आशीर्वाद बड़े स्तर पर कायम रहेगा

आज के बागेश्वर का राजनैतिक परिदृश्य-

बागेश्वर जनपद में आज की तारीख में भारतीय जनता पार्टी के अंदर पूर्व विधायक चंदन रामदास तथा पार्वती दास के छोटे पुत्र भाष्कर दास का नाम नौजवानों की जुबान पर सबसे आगे चल रहा है तो सौरभ दास के पीछे जिला पंचायत की पूर्व अध्यक्ष दीपा आर्य तथा वर्तमान अध्यक्ष का नाम भी पीछे-पीछे कभी तेजी से कभी धीरे-धीरे दौड़ में प्रतिस्पर्धा करता हुआ दिख रहा है। भारतीय जनता पार्टी का एक बड़ा धड़ा अंदर खाने यह भी मान रहा है कि भाजपा किसी नए नाम को भी मैदान में उतार कर सबको चैंका सकती है। वह नया नाम कौन होगा पर बहुत सारे कयास लग भी रहे हैं।

जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है तो टिकट की दावेदारी की दौड़ में थोड़े से अंतर से मध्यावती चुनाव हारे बसंत कुमार के नाम का कयास भले ही सबसे ऊपर है पर यह नाम तभी सार्वजनिक होगा जब छत्रप का आशीर्वाद भी बना रहेगा। बागेश्वर विधानसभा में कांग्रेस प्रत्याशियों की पंक्ति में बालकृष्ण का नाम भी मौजूद है तो पूर्व विधायक, पूर्व सांसद, पूर्व राज्यसभा सदस्य प्रदीप टम्टा का नाम भी बागेश्वर में कांग्रेस प्रत्याशियों की सूची में दमदार तरीके से टंक चुका है।

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