बागेश्वर में उत्तराखंड के लोकपर्व हरेला पर जहां पूरे प्रदेश में प्राकृतिक संरक्षण और पौधरोपण का संदेश दिया गया, वहीं बागेश्वर में सवाल संगठन ने विकास कार्यों के नाम पर हो रहे पेड़ों की अंधाधुंध कटान के विरोध में जिलाधिकारी कार्यालय परिसर में 2 घंटे का सांकेतिक धरना देकर पर्यावरण संरक्षण और वनों पर जनता के स्वामित्व की बहाली की मांग उठाई।
इस अवसर पर सवाल संगठन के अध्यक्ष रमेश कृषक ने कहा कि हरेला केवल पौधरोपण का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आस्था, सांस्कृतिक विरासत और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक है। पहाड़ पर सदियों से हरेले का त्यौहार मनाया जा रहा है इस त्यौहार पर अपने घर के आसपास या अपनी जमीन पर पौध रोपने की परंपरा भी सदियों पुरानी है। पौधा चारा पत्ती के वृक्ष का या फिर ऐसे फल वृक्ष का रोपा जाता है जो चारा पत्ती भी देता हो।
रमेश कृषक ने कहा किउत्तराखंड राज्य में हरेला पर्व को सरकारी पर्व बनाए जाने की जितनी अधिक सराहना की जाए उतनी कम है लेकिन जब हरेला पर्व को धूमधाम से मानने वाली सरकार विकास के नाम पर या फिर विकास की आड़ में बेदर्दी से वृक्षों की हत्या करने पर आमादा हो तथा पर्वतीय क्षेत्र के बृहद भूभाग की ऊपरी सतह को तहस-नहस कर देना चाहती हो तब सरकार पर सवाल भी खड़े होते हैं और जनता को चेताना भी बनता ही है।
उन्होंने कहा गंगोत्री जैसे अति संवेदनशील क्षेत्र में 6000 देवदार के पेड़ काट दिए गए, आजकल ही में ऋषिकेश से देहरादून के मध्य 4000 पेड़ों की निर्मम हत्या की जा रही है जिसके खिलाफ वहां के नौजवान और सुधि लोग सड़कों पर भी उतरे हुए हैं, अल्मोड़ा से ताकुला होते हुए बागेश्वर, कांडा, उड़यारी बैन्ड और उससे आगे रामेश्वर तक रोड का बृहद चौड़ी करण करने का कार्य चलना है । रोड चौड़ीकरण जब होगा तब होगा लेकिन पहले चरण में हजारों पेड़ काटे जा चुके हैं यदि छोटे-बड़े पेड़ों को गिनती में उतरा जाए तो यह संख्या 80 हजार को पार कर सकती है।हम पहाड़ के लोगों ने कभी नहीं कहा कि पहाड़ पर दो लेन से अधिक चौड़ी सड़क बनाएं हम तो कहते हैं कि सामरिक महत्व भी अगर सामने खड़ा हो तब भी डेढ़ लेन से अधिक चौड़ी सड़क पहाड़ पर नहीं बनाई जानी चाहिए।
उन्होंने कहा हमारा मानना है कि सड़कों की चौड़ाई बढ़ाने के नाम पर आप सिर्फ लाखों लाख पेड़ ही नहीं काट रहे हैं बल्कि पहाड़ की भूगर्भीय संरचना के साथ भी बेरहम छेड़छाड़ कर रहे हैं। भूगर्भ विज्ञान में सबसे महत्वपूर्ण शब्द हाइड्रो जियोलॉजी है, पहाड़ पीने के पानी के संकट को झेल रहा है यदि हम पहाड़ पर हाइड्रो जियोलॉजी के साथ छेड़छाड़ करते हैं तो निश्चित रूप से पहाड़ पानी के लिए तरस जाएगा।
सवाल संगठन के अध्यक्ष रमेश कृषक ने यह भी कहा कि पहाड़ में जल जंगल जमीन को बचाने की लड़ाई स्वतंत्रता संग्राम में भी लड़ी गई थी, स्वतंत्र भारत में वर्ष 70 से 80 के बीच में जंगलात का आंदोलन उत्तराखंड में चला था, राज्य बनने के बाद भी हमारी सरकार जल जंगल जमीन को बचाने के क्षेत्र में फिसड्डी साबित हो रही है तो सरकार के इस फिसड्डी पन की चिंता जनता को करनी ही होगी ।
सरकार एक पेड़ मां के नाम जैसे अभियान चलाकर पौधरोपण कर पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा नहीं दे रही है वरन वृक्षारोपण के नाम से राजनीति कर रही है।
रमेश कृषक ने कहा कि विकास के नाम से अति संवेदनशील पहाड़ों पर लाखों लाख पेड़ों का कटान किया जा रहा है लेकिन काटे गए पेड़ों के एवज में क्षतिपूरक वन पहाड़ पर कहां विकसित किये जा रहे हैं का उत्तर हमारी सरकारों के पास नहीं है। उनका कहना है कि हरे-भरे पेड़ केवल हरियाली के प्रतीक नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सांसें हैं। यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया तो पहाड़ का भविष्य गंभीर संकट में पड़ जाएगा।
सवाल संगठन ने शासन को जिताया है कि अनावश्यक पेड़ों की कटान पर रोक लगा कर व्यापक स्तर पर क्षतिपूरक वन उन्हीं क्षेत्रों में विकसित किए जाएं जिन क्षेत्रों में पेड़ों को काटा जा रहा है । संगठन का मानना है कि यदि पहाड़ के लोग पर्यावरण संरक्षण और जल जंगल जमीन पर समाज के स्वामित्व की बहाली के ऐतिहासिक मुद्दों पर वोट देना शुरू कर दें तो पहाड़ों को बर्बाद होने तथा पहाड़ पर पलायन को रोका जा सकता है।




